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भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल का विशेष स्थान है। ताल न केवल लय का आधार है, बल्कि गायन और वादन की आत्मा भी है। जब ताल अति विलंबित लय में प्रस्तुत होती है, तब उसका प्रभाव और भी गहरा हो जाता है। ऐसी ही एक अत्यंत गंभीर, शास्त्रीय और भावपूर्ण ताल है तिलवाड़ा ताल। तिलवाड़ा ताल का प्रयोग विशेष रूप से ख़याल गायन के विलंबित अंग, ध्रुपद-प्रभावित बंदिशों तथा गंभीर रागों में किया जाता है। तिलवाड़ा ताल का परिचय तिलवाड़ा ताल एक 16 मात्राओं की ताल है, परंतु इसकी चाल और ठहराव इसे तीनताल से अलग पहचान देते हैं। तीनताल की तुलना में तिलवाड़ा अधिक गंभीर, शांत और विस्तार प्रधान ताल मानी जाती है। इसका स्वरूप गायन को खुलकर फैलने का अवसर देता है। मात्राएँ: 16 विभाग: 4 (4+4+4+4) ताली–खाली व्यवस्था: पहली मात्रा – ताली पाँचवीं मात्रा – ताली नौवीं मात्रा – खाली तेरहवीं मात्रा – ताली ठेका (परंपरागत रूप): धा – धा | तिट – धा | धा – धा | ता – तिट अति विलंबित लय में यह ठेका बहुत ही फैलाव के साथ बजाया जाता है, जिससे हर मात्रा का महत्व बढ़ जाता है। अति विलंबित लय का महत्व अति विलंबित लय वह अवस्था है, जहाँ ताल बहुत धीमी गति से चलती है। इसमें गायक को स्वर विस्तार, मींड, गमक, कण, और भाव अभिव्यक्ति का पूरा अवसर मिलता है। यह लय साधना और धैर्य की परीक्षा होती है। अति विलंबित तिलवाड़ा में— हर स्वर को ठहराव मिलता है श्वास-प्रश्वास नियंत्रित होता है राग का वास्तविक स्वरूप निखरता है भाव, रस और गंभीरता स्पष्ट होती है तानपुरा B पिच का महत्व B पिच (बी स्केल) मध्यम ऊँचाई की पिच मानी जाती है। यह न बहुत भारी होती है और न ही बहुत तीखी। अधिकांश पुरुष गायकों और कुछ महिला गायकों के लिए यह पिच अत्यंत अनुकूल होती है। तानपुरा जब B पिच पर लगाया जाता है, तो— स्वर स्थिर और संतुलित रहते हैं गले पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता लंबा अभ्यास संभव होता है राग की गंभीरता और खुलकर उभरती है तानपुरा स्वर संयोजन (B पिच): मंद्र म – सा – सा – प या मंद्र प – सा – सा – सा यह संयोजन अति विलंबित तिलवाड़ा के साथ विशेष शांति और स्थिरता प्रदान करता है। अभ्यास की प्रारंभिक तैयारी अभ्यास से पहले वातावरण शांत होना चाहिए। शरीर सीधा, रीढ़ की हड्डी स्थिर और मन एकाग्र हो। सबसे पहले तानपुरा को B पिच पर ठीक से मिलाएँ। तानपुरे की झंकार पूरी तरह स्पष्ट और संतुलित होनी चाहिए। इसके बाद— आँखें बंद करके तानपुरे के नाद को सुनें “सा” स्वर को मन ही मन महसूस करें श्वास को गहरा और नियमित रखें यह प्रक्रिया कम से कम 5–10 मिनट करें। स्वर साधना – तिलवाड़ा ताल में अति विलंबित तिलवाड़ा में स्वर साधना करते समय हर मात्रा पर स्वर को टिकाना आवश्यक है। स्वर अभ्यास उदाहरण: सा —— रे —— रे —— ग —— ग —— म —— म —— प —— प्रत्येक स्वर को पूरी मात्रा में ठहराकर गाएँ। तानपुरा निरंतर चलता रहे और तबला बहुत धीमी गति में तिलवाड़ा ठेका बजाए। बंदिश का प्रयोग तिलवाड़ा ताल का वास्तविक सौंदर्य विलंबित ख़याल बंदिश में दिखाई देता है। बंदिश को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर गाएँ। सम पर आने की पूरी सजगता रखें। अति विलंबित लय में— बंदिश को खींचकर न गाएँ शब्दों की स्पष्टता बनाए रखें बोल-आलाप का प्रयोग करें सम को मन में पहले से महसूस करें बोल-आलाप और विस्तार तिलवाड़ा ताल अति विलंबित में बोल-आलाप अत्यंत प्रभावशाली होता है। “ना”, “रे”, “तुम”, “मोरे” जैसे सरल बोलों पर स्वर विस्तार करें। तानपुरा B पिच में स्थिरता देता है, जिससे आलाप गहराई तक जाता है। मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव अति विलंबित तिलवाड़ा ताल और तानपुरा B पिच का अभ्यास केवल संगीत अभ्यास नहीं, बल्कि ध्यान साधना भी है। यह मन को शांत करता है, चित्त को एकाग्र करता है और भीतर स्थिरता लाता है। नियमित अभ्यास से— तनाव कम होता है स्वर में गंभीरता आती है आत्मविश्वास बढ़ता है राग की समझ गहरी होती है अभ्यास की अवधि और नियम प्रतिदिन कम से कम 45–60 मिनट सप्ताह में 1–2 दिन केवल विलंबित अभ्यास पहले स्वर, फिर बंदिश, फिर आलाप जल्दबाज़ी से बचें निष्कर्ष तिलवाड़ा ताल अति विलंबित, जब तानपुरा B पिच के साथ साधा जाता है, तो वह संगीत साधक को धैर्य, गंभीरता और भाव की उच्च अवस्था तक ले जाता है। यह ताल गायन को परिपक्व बनाती है और कलाकार के भीतर स्थिरता पैदा करती है। जो विद्यार्थी इस ताल का नियमित अभ्यास करते हैं, उनके स्वर में ठहराव, गहराई और शास्त्रीयता स्वतः आ जाती है। यह अभ्यास संगीत को केवल कला नहीं, बल्कि साधना बना देता है। #TilwadaTaal #AtiVilambit #TanpuraBPitch #HindustaniClassical #KhayalGayan #RiyazTime #LaySadhna #ClassicalMusicPractice #IndianClassicalMusic #MusicMeditation 🎶