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चित्रकूटधाम की भूमि प्रेम करुणा, त्याग,वात्सल्य,तपस्या और त्याग की भूमि है। इस भूमि का प्रभाव ही ऐसा है कि अवध की सत्ता यहाँ पर फुटबॉल की तरह लुडकती दिखी।राम वापस अयोध्या जाने को तैयार नही तो भरत गद्दी पर बैठने को किसी भी कीमत पर तैयार नही।राम को देख भरत लाठी की तरह उनके चरणों मे गिरे तो राम में उन्हें उठाकर अपने सीने से लगा लिया। भाइयों के इस प्रेम को देखर चित्रकूटधाम के पाषाण भी रो उठे,उनके इतने आंसू निकले की श्री राम भरत ही नही अपितु माता सीता व राजमाता कौशल्या और लक्ष्मण और शत्रुघन के चरण चिन्ह आज भी पत्थरो पर साफ दिखाई देती है। इनकी कार्बन डेटिंग के साथ कईं बार शोध दल आकर प्रमाणिकता को सच की कसौटी पर परख कर चुके है। हर बार इन्हें सत्य का आवरण ही ओढ़ाया गया। वैसे श्री रामजी के चरण चिन्ह चित्रकूट में और भी स्थानों पर है,पर इतने साफ तौर पर इतने साफ कही दिखाई नही देते। वैसे बाद में महर्षि वशिष्ठ और स्थानीय तमाम ऋषियों की आज्ञानुसार श्री राम जी के राजतिलक को लाया गया जल भरतकूप में एक कुएं में डाल गया और श्री रामजी की खड़ाऊ भरतजी को सौपी गई। इसमे महत्वपूर्ण बात यह थी 14 साल तक तत्कालीन महाजनपद अयोध्या की सत्ता पर राम जी या भरतजी ने प्रशासन सम्बन्धी कोई निर्णय नही लिया। बल्कि सिंहासन पर श्री राम की चरण पादुका रखी गई और उनके सेवक की तरह तपस्वी वेश में श्री शत्रुघन जी ने राजकार्य सम्पादित किये। इन सबमे सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि जहाँ सम्पूर्ण अयोध्या जी मे किसी भी प्रकार के उत्सव या मांगलिक कार्यो से जनता ने खुद स्वेच्छा से दूरी बनाई। यानि विवाह आदि मंगलकार्य 14 सालों तक अयोध्या में हुए ही नही साथ ही अपने चारों राजपुत्रो को तपस्वी वेश में देखकर सम्पूर्ण अयोध्यावासी ऋषि जीवन जीने लगे।