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YP:-12 कसम शंकर भगवान की हम NTPC-CSR के दायरे में हैं रोशनी के नहीं #ntpc #CSRReality #groundreality #rashan उत्तर प्रदेश का एक जिला है सोनभद्र। दिल्ली से लगभग हज़ार किलोमीटर दूर। काग़ज़ों में यह दूरी सिर्फ़ भौगोलिक है, लेकिन ज़िंदगी में यह दूरी सत्ता, नीति और संवेदना की है। सोनांचल और ऊर्जांचल कहलाने वाला यह इलाका देश के विकास का इंजन माना जाता है। यहाँ से निकली बिजली महानगरों की रातों को रोशन करती है, उद्योगों के पहिए घुमाती है और सत्ता के दावों को मज़बूती देती है। लेकिन इसी रोशनी की जड़ों में बसे गाँव आज भी अँधेरे, अभाव और अपमान की ज़िंदगी जी रहे हैं। सोनभद्र के ओबरा, अनपरा, बीजपुर, रीहंद नगर, म्योरपुर, बभनी, जुगैल, दुद्धी जैसे इलाक़ों में NTPC और उससे जुड़ी अन्य बिजली परियोजनाएँ दशकों से चल रही हैं। इन परियोजनाओं के साथ एक शब्द हमेशा जोड़ा जाता है—CSR, यानी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी। नियम साफ़ कहते हैं कि परियोजना क्षेत्र के आसपास लगभग 25 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों की बुनियादी ज़रूरतों की ज़िम्मेदारी कंपनी की होगी। बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार, सामाजिक विकास। यह सब शायद किसी समय फ़ाइलों में बहुत सलीके से लिखा गया होगा। प्वाइंट वाइज़, चार्ट और ग्राफ़ के साथ। लेकिन ज़मीन पर आते-आते यह ज़िम्मेदारी या तो सिकुड़ गई या फिर किसी और के कंधे पर डाल दी गई। पुरानी मनरेगा योजना के तहत जो काम मिलता था, उससे नून-रोटी का जुगाड़ कैसे होता था, यह सवाल भी यहाँ बेमानी सा हो गया है। काम सीमित, मज़दूरी देर से और भुगतान में कटौती। अब उसी योजना का नाम बदलकर ‘जी राम जी’ कर दिया गया है। नाम बदल गया, लेकिन मज़दूर की हालत नहीं बदली। जल-जंगल-ज़मीन के असली मालिक आज भी असुरक्षित हैं। हरिजन बस्तियों में बिजली मीटर लगाने के नाम पर छूट की एक योजना है—1050 रुपये में कनेक्शन। काग़ज़ों में यह राहत है, ज़मीन पर यह एक और दीवार। आधार कार्ड ये लोग दिखा सकते हैं, क्योंकि आज हर सरकारी दरवाज़े पर सबसे पहले यही माँगा जाता है। लेकिन 1050 रुपये कहाँ से आएँ, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। सरकार का यह आधार इन्हें तिलिस्मी चाबी जैसा दिखता है, लेकिन चाबी से ताला तभी खुलेगा जब भीतर कुछ रखने लायक़ हो। यहाँ भीतर अक्सर खालीपन है। जिनके पास बिजली कनेक्शन है—लीलादेवा, रीहंद नगर, बीजपुर और आसपास के गाँव—उनकी कहानी भी अलग नहीं है। कनेक्शन है, लेकिन बिल भरने की औक़ात नहीं। मजबूरी में लाइनमैन से समझौता, कभी ‘कटिया’, कभी अस्थायी जोड़। बिजली चोरी यहाँ अपराध नहीं, मजबूरी बन चुकी है। बिजली विभाग भी इस व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है—दया के नाम पर सुविधा शुल्क, आँख मूँदकर चलती व्यवस्था। सब कुछ ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन नैतिकता की बात यहाँ भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। स्वास्थ्य सेवाओं की हालत यह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुँचना संघर्ष बन जाता है। बिजली परियोजनाओं के बीच बसे गाँवों में भी रात के समय डिलीवरी मोबाइल या टॉर्च की रोशनी में होती है। एम्बुलेंस का नंबर याद है, लेकिन नेटवर्क नहीं। बिजली पैदा करने वाले इलाक़े में मोबाइल चार्ज करने के लिए भी कई बार पड़ोसी गाँव जाना पड़ता है। ओबरा के स्कूल का मामला दरअसल पूरे सोनभद्र की तस्वीर है। CSR का पैसा, संसाधन और ज़िम्मेदारी सब कुछ होते हुए भी परिणाम शून्य के आसपास है। स्कूल निजी संस्था को सौंप दिया गया, स्वास्थ्य सेवाएँ काग़ज़ों में सिमट गईं, रोज़गार दलालों के हाथों गिरवी हो गया और योजनाएँ ‘जय राम जी’ के नाम पर टाल दी गईं। म्योरपुर, बीजपुर, बभनी, जुगैल, दुद्धी, नगवां, चोपन—हर जगह लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं। अगर देश की बिजली हमसे बनती है, तो अँधेरा हमारा क्यों है। अगर CSR हमारा हक़ है, तो वह हमें क्यों नहीं मिलता। अगर योजनाएँ हमारे नाम पर हैं, तो ज़मीन पर उनका असर क्यों नहीं दिखता। यह रिपोर्ट किसी एक गाँव या एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह उस विकास मॉडल की कहानी है जिसमें संसाधन पहले आते हैं, इंसान बाद में। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें जल-जंगल-ज़मीन लेने के बाद यह मान लिया जाता है कि मुआवज़ा देकर कर्ज़ उतार दिया गया। लेकिन मुआवज़ा कभी भविष्य की भरपाई नहीं कर सकता। सोनभद्र आज भी इंतज़ार में है। रोशनी का, शिक्षा का, सम्मान का। CSR के हक़ का। सवाल यह नहीं कि यह हक़ मिलेगा या नहीं। सवाल यह है कि कब मिलेगा, और क्या तब तक यहाँ की एक और पीढ़ी अँधेरे, अभाव और दलालों के बीच पिसती रहेगी। यह सवाल सिर्फ़ सोनभद्र का नहीं, उस पूरे विकास दर्शन का है, जो मेगावाट तो गिनता है, लेकिन इंसानी ज़िंदगी नहीं। ABOUT US (Newz TRAY) NewzTray वही दिखाता है जो दुनिया अक्सर छुपा लेती है। हम किसी एजेंडा, किसी कैंप, किसी रंग या किसी सत्ता के नहीं—**सिर्फ़ सच के हैं।** खुली आंखों से, बिना फिल्टर, बिना स्क्रिप्ट, सीधे कैमरे में कैद हकीकत हम आपके सामने रखते हैं। यहां न कॉपी है, न पेस्ट। न किसी की शब्दशः राय, न किसी का प्रायोजित नैरेटिव। हम ज़मीन पर उतरकर वही बताते हैं जो वहां सच में हो रहा है—**नीतियों की चमक के पीछे छुपी खामियां भी, और अफवाहों की धुंध में खोए सच भी।** NewzTray का उद्देश्य एक ही है— देश को वह दिखाना जो आंखों से दिखता है, कानों से सुना जाता है, और जनता महसूस करती है। --- YOUTUBE CHANNEL DESCRIPTION (Newz TRAY) NewzTray – यहाँ सिर्फ Fact-Based Ground Reality मिलती है। कोई प्रोपेगंडा नहीं, कोई पॉलिसी की चमकदार पैकिंग नहीं, कोई राजनीतिक नकली तर्क नहीं। हम कैमरा लेकर ज़मीन पर उतरते हैं और वही दिखाते हैं जो असली दुनिया में हो रहा है। हमारी पहचान: – Zero Propaganda – Zero Cut–Paste Journalism – 100% Ground Reporting – थोपी गई कहानियों से आज़ाद सच अगर आप भी वही देखना चाहते हैं जो आपसे छुपाया जाता है— तो NewzTray को सब्सक्राइब कीजिए। यहाँ मिलता है सिर्फ **सच**, बिना किसी रंग-रोगन के।