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विवरण (Description): जय सियाराम! इस वीडियो में एकतानाथ, गुरु योगी तुलसीनाथजी बापू रामायण के एक अत्यंत गहरे और आध्यात्मिक प्रसंग पर प्रकाश डाल रहे हैं। वे बताते हैं कि मिथिला नरेश राजा जनक, जिन्हें 'विदेही' (देह के भाव से मुक्त) कहा जाता है, उन्होंने जब पहली बार भगवान श्री राम को देखा, तो उनकी क्या दशा हुई। वीडियो के मुख्य बिंदु: ▶️राग बनाम अनुराग: माता मां समझाते हैं कि संसार की वस्तुओं या देह के प्रति आकर्षण 'राग' है, लेकिन परमात्मा के प्रति जो प्रेम उमड़ता है, वह 'अनुराग' है [03:48]। ▶️विदेही राजा जनक: राजा जनक आत्मज्ञानी थे और उन्हें अपना शरीर भी दिखाई नहीं देता था, फिर भी श्री राम को देखकर वे प्रेम में मग्न हो गए क्योंकि उन्होंने राम जी में उसी दिव्य चैतन्य को देखा जो उनके भीतर था [04:49]। ▶️परमात्मा पर अटूट विश्वास: जनक जी जानते थे कि श्री राम साक्षात ब्रह्म हैं, इसीलिए सीता जी के वनवास या त्याग पर उन्होंने कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया, क्योंकि वे जानते थे कि ईश्वर जो करते हैं वह सही होता है [06:56]। ▶️बालक जैसा निश्चल मन: ईश्वर को पाने के लिए बालक जैसा निष्कपट और सरल होना आवश्यक है। जैसे माँ अपने छोटे बच्चे का पूरा ध्यान रखती है, वैसे ही ईश्वर अपने भक्त का ध्यान रखते हैं [19:11]। ▶️प्रेम की वास्तविक परिभाषा: सच्चा प्रेम स्वयं को मिटा देने और समर्पित करने का नाम है, जिसमें अपनी खुशी नहीं बल्कि सामने वाले की खुशी देखी जाती है [13:33]। यह सत्संग हमें सिखाता है कि ज्ञान मार्ग पर चलते हुए भी हृदय में भक्ति और प्रेम का होना कितना अनिवार्य है। प्रवक्ता: एकतानाथ गुरु योगी तुलसीनाथजी बापू स्थान: गिरनार शनिदेव मंदिर, जूનાગઢ