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जय परमेश्वर तुम जोयह कलजग२कहतेहो-सो,कलुकाल,कोइ-चीजनहीहे यहतो बनीयोंने!राक्षसीपापचलायाहे!सो रावण हिरनाकशके मुवाफीक पाप!चलायाहे!सोइसका-नांम,बनीयोंने कलुकाल रखदीयाहे,सो,जीसतरहसे,कि,रावणने संसारके नांमका पापकराकेःसबकी.बुद्धी.भ्रष्टकरदीथी उसीतरहसे इन.बनीयोंनेभी. चकवे:राजकरनेकी-वजहसे सबकी बुद्धी!भ्रष्टकरदीहे!सो!इस!कलुकालके पापको सब-मीलके छोडाओगे;तो-सदा-सतजगहीहे अगर पापको फीर कभी-नहीचलनेदोगे-और:पुरा२बंन्दोबस्त सब वलायतोंमें-रक्खोगे-तोसब-संसारमें-सुखरहेगा सोयह जाल कदीमसे;बनीयोंकाहीहे.और हिंन्दुस्तांनमेंसेही चलाहे ..... ( २७१ ) अज तसनीफ साध अनुपदास लीखी- कीताब - [ जगतहीतकारनी ] ( २७४ ) तमांम पढ़कर बंन्दोबस्त करो श्री अनुपदास - प्रीटिंग प्रेस छावणी ऐरनपुरामें, शिवगंज - ३०७०२७ ( मारवाङ ) ता १७ अप्रेल संन १९०९ झा बैसाष बुदी १२ सं॥ १९६५ M. No. :- 8905653801 www.jagathitkarnioriginal.org