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पर्दा उठता है और नेपथ्य में कहीं दूर से आती रोशनी बस आधी ही है... जैसे कोई अधूरा सच सामने आकर मुझसे आँखे चुरा रहा हो..! तुम गए - ये शब्द कहे नहीं गए, बस गूँजे... हृदय तल के सन्नाटों में जैसे कोई खाली स्टेज पर ताली बजा रहा हो..! मेरे सामने एक कुर्सी है, जहाँ तुम कभी बैठा करते थे अब वो कुर्सी मुझे घूरती है, कहती है - "देख, मैं भी अकेली हूँ... तेरी तरह जैसे कोई विरह गा रहा हो..! मंच पर अब भी तुम्हारी आवाज़ आती है, तुम्हारी हँसी का छल्लेदार धुआँ अब भी हवा में घूमता है, पर मैं उसे पकड़ नहीं सकती क्योंकि अब वो किरदार नहीं रहा, एक छाया बन गया है जो कहीं दूर जा रहा हो ..! तुम्हारे जाने के बाद मैंने अभिनय करना छोड़ दिया है अब मैं सच में रोती हूँ हर किरदार में हर दृश्य में अब आंसू ग्लिसरीन से नहीं, तुम्हें याद करते ही आ जाते हैं जैसे घाटी से, कोई बारिश में आवाज लगा रहा हो ..! क्या तुमने कभी किसी स्टेज को रोते देखा है? नहीं ना? मगर मेरी अदाकारी के बाद वो लकड़ी की ज़मीन भीग जाती है जैसे कोई सीली-सीली लकड़ियां जला रहा हो ..! अब मैं मंच पर अकेली होती हूं ना संवाद हैं, ना दृश्य, ना निर्देशक - बस एक लंबा, अनंत एकालाप जो मैं ख़ुद से करती हूँ, तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना, जैसे कोई टूटा हृदय विलाप कर रहा हो..! "प्रेम जब जाता है, तो कहानी नहीं ले जाता... वो संग ले जाता है किरदार को और उसे अपनी जादूगरी से अदृश्य कर देता है और मंच - हमेशा सूना सा रहता है, जैसे कोई धुंध में हमेशा के लिए विलीन हुए जा रहा हो..! -डॉ वंदना श्रीवास्तव की शानदार प्रेम कविता. #hindikavita #VandanaShrivastava #lovepoetry #SanjeevPaliwal