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ॐ मणि पद्मे हूँ यह बौद्ध धर्म का अत्यंत पवित्र और करुणा से परिपूर्ण मंत्र है। इसे करुणा के बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर (चेनरेज़िग / करुणामय) का बीज-मंत्र माना जाता है। मंत्र का आध्यात्मिक अर्थ ॐ मणि पद्मे हूँ का शाब्दिक अर्थ अक्सर इस प्रकार समझाया जाता है— “कमल के भीतर स्थित रत्न” लेकिन इसका गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ इससे कहीं गहरा है। मणि (रत्न) → करुणा, प्रेम और जागरूकता पद्मे (कमल) → संसार की कीचड़ में रहते हुए भी निर्मल चित्त हूँ→ प्रज्ञा, स्थिरता और बोधि (जागृति) अर्थात्— मनुष्य संसार में रहते हुए भी करुणा और प्रज्ञा से बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है। मंत्र के छह अक्षर और उनका गूढ़ भाव यह मंत्र छह ध्वनियों से बना है, जो छह क्लेशों को शुद्ध करते हैं: 1. ॐ– अहंकार का शोधन 2. म – ईर्ष्या का शमन 3. णि – आसक्ति (लोभ) का क्षय 4. प – अज्ञान का नाश 5. द्मे– कामना और वासना का शुद्धिकरण 6. हूँ– क्रोध और द्वेष का रूपांतरण इन छह अक्षरों का जप छह लोकों के दुःख से मुक्ति का प्रतीक भी है। मंत्र का आध्यात्मिक प्रभाव हृदय में करुणा और मैत्री का विकास मन की अशांति और भय में कमी ध्यान में गहराई और स्थिरता कर्मों की शुद्धि और चित्त की निर्मलता दूसरों के दुःख को समझने की संवेदना बौद्ध परंपरा में कहा जाता है— यदि कोई व्यक्ति इस मंत्र का जप करुणा भाव से करता है, तो वह स्वयं के साथ-साथ समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए कंपन उत्पन्न करता है। जप करने की विधि (सरल) शांत स्थान पर बैठकर श्वास के साथ मन में या धीमे स्वर में जप प्रत्येक जप में करुणा का भाव रखें माला हो तो 108 बार, न हो तो भी श्रद्धा ही पर्याप्त है ---सार भाव ॐ मणि पद्मे हूँ । कोई चमत्कारी शब्द नहीं, बल्कि 👉करुणा को जीवन में उतारने की साधना है। 👉 बुद्धत्व की ओर ले जाने वाला स्मरण है।