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🌸 मन रे तू नेकी कर ले, दो दिन के मेहमान 🌸 संत कबीर दास जी का अमर भजन जो जीवन को दो दिनों का मेहमान बता कर नेकी, सत्संग और गुरु भक्ति का संदेश देता है। कहाँ से आए, कहाँ जाएँगे? तन छूटे मन कहाँ रहेगा? बिना गुरु के आत्मज्ञान कैसे मिलेगा? ��पूर्ण भावार्थ: यह भजन हमें सिखाता है कि संसार माया का मेला है – जोरू, लड़का, कुटुंब सब क्षणभंगुर। युगों-युगों से मरते-जीते फिर रहे हो, अब अभिमान छोड़ो। हिल-मिल रहो, नेकी सिखाओ और सदगुरु नाम जपो। कबीर कहते हैं, लाख चौरासी का चक्कर भोग चुके हो, अब सच्ची पहचान कर लो! ��Lyrics Snippet: मन रे तू नेकी कर ले, दो दिन के मेहमान... कहाँसे आया कहाँ जाएगा, तन छूटे मन कहाँ रहेगा... गुरु बिन आत्म ज्ञान... रहेंट माल पनघट ज्यों फिरता, आता जाता भरता रीता... कहत कबीर सुनो भाई साधो, जपना सदगुरू नाम! ��👍 Like, Share & Subscribe करें भजन प्रेमियों के लिए daily devotional content! #KabirBhajan #NekiKarLe #SantKabirDas #BhaktiGeet full lyrics: मन रे नेकी कर ले, दो दिन का मेहमान । कहाँ से आया कहाँ जायेगा, तन छूटे मन कहाँ रहेगा । आखिर तुमको कौन कहेगा, गुरु बिन आतम ज्ञान । १ भाई भतीजा कुटुम कबीला, दो दिन का तन मन का मेला । अन्तकाल तो चला अकेला, तज माया मंडान । २ कौन है साँचा साहब जाना, झूठा है यह सकल जहाना । कहाँ मुकाम और कहाँ ठिकाना, क्या बस्ती का नाम । ३ रहट माल पनघट ज्यों फिरता, आता जाता भरता रीता । युगन युगन तू मरता जीता, मत करना अभिमान । ४ हिल मिल रहना दे के खाना, नेकी बात सिखावत रहना । कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जपना सद्गुरु नाम । ५