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यह प्रवचन ओशो की शैली से प्रेरित एक गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विमर्श है — लेकिन यह ओशो की नक़ल नहीं है, बल्कि उनकी दृष्टि की दिशा में एक स्वतंत्र यात्रा है। ओशो ने हमेशा कहा कि प्रतिक्रिया अचेतन है, प्रतिसाद सचेतन है — और यही इस पूरे प्रवचन की धुरी है। जब कोई अपमान करता है, तो जो भीतर उठता है — गर्मी, काँपना, चिल्लाने की तड़प — वो यांत्रिक है, स्वचालित है, conditioning है। ओशो कहते थे कि जो इंसान अपनी प्रतिक्रियाओं से संचालित होता है, वो मशीन है — मनुष्य वो है जो बीच में रुककर चुनता है। यह प्रवचन उसी “रुकने की जगह” को खोजता है — नौ परतों में, धीरे-धीरे, बिना उपदेश दिए। ओशो की तरह यहाँ सामने वाले को खलनायक नहीं बनाया गया। उनकी दृष्टि हमेशा करुणा की थी — कि जो दर्द देता है, वो ख़ुद दर्द में है। इस प्रवचन में सामने वाले की मानसिक संरचना को आठ परतों में खोला गया है — डर, अधूरी ज़रूरत, पुरानी conditioning, अहंकार रक्षा तंत्र — ठीक वैसे ही जैसे ओशो किसी एक घटना से पूरे मानव मनोविज्ञान का नक्शा खोल देते थे। लेकिन — और यह ओशो की एक बहुत ग़लत समझी गई बात है — करुणा का मतलब समर्पण नहीं है। ओशो ने कभी नहीं कहा कि सब सहो। उन्होंने कहा — जागकर देखो, समझो, और फिर अपनी जगह से चुनो। इस प्रवचन में “समझना ≠ सहना” की रेखा इसी भाव से खींची गई है — शांत सीमाएँ, स्पष्ट संवाद, और आवश्यक हो तो सचेतन दूरी। ओशो का सबसे केंद्रीय विचार था — साक्षीभाव। देखना, बिना जुड़े। महसूस करना, बिना बह जाने के। यह प्रवचन उसी दिशा में ले जाता है — भावनाओं का गुलाम न बनो, लेकिन उन्हें दबाओ भी नहीं। बस देखो कि भीतर क्या हो रहा है — शरीर में, मन में, अहंकार में — और उस देखने में ही एक जगह बनती है जहाँ से चुनाव संभव होता है। अंत में, ओशो की ही तरह, यह प्रवचन किसी नारे से नहीं, बल्कि एक शांत आंतरिक शक्ति से समाप्त होता है — कि असली ताक़त शोर नहीं करती, और अपमान का सबसे गहरा उत्तर आपकी अपनी जड़ों की स्थिरता और चुनाव की स्वतंत्रता है। #Osho #OshoHindi #OshoSpeech #OshoPravachan #OshoHindiSpeech #RajneeshOsho #OshoMeditation #OshoWisdom #OshoMotivation #OshoQuotes #ओशो #ओशोप्रवचन #ओशोविचार #ओशोध्यान #आध्यात्मिकज्ञान