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इंद्र नारदजी से कह रहे हैं, अतएव हमारे प्रति भगवान की कृपा ही कहाँ हैं? भगवान का दर्शन ही दुर्लभ है। प्रभु शीघ्र ही आकर मेरे द्वारा प्रस्तुत अर्घ्य आदि पूजाको स्वीकार तो करते हैं, किन्तु जब हमलोग उनसे प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! हमलोग आपके कृपापात्र हैं, तब वे हमें वञ्चना करनेके अभिप्रायसे कहते हैं कि 'जब तक मैं यहाँ आगमन नहीं करता, तब तक तुमलोग ब्रह्मा और शिवजी की पूजा करना। ब्रह्मा और शिवजी और विष्णु में कोई अंतर नहीं है... शास्त्रों में ऐसा कहने पर यह समझना होगा कि विष्णु ही ब्रह्मा और शिवजी बने है। ( योग्य व्यक्ति न मिलने पर) उनका निवास स्थान भी अनिश्चित है। मुनियोंके लिए भी दुर्लभ उनका वासस्थान हमारे लिए सर्वथा अगम्य है। वे कभी तो वैकुण्ठमें, कभी ध्रुवलोकमें और कभी-कभी क्षीरसागरके बीच श्वेतद्वीपमें वास करते हैं। इस समय श्रीभगवान् द्वारकामें वास कर रहे हैं, तब भी हम उनका दर्शन नहीं कर सकते। क्योंकि ____ वहाँ भी कोई नियम नहीं है। कभी तो वे पाण्डवोंके यहाँ और कभी मथुरामें वास करते हैं। मथुरामें निवास करते समय भी कभी तो मधुपुरी और कभी गोकुलमें वास करते हैं। गोकुलमें वास करते समय भी एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते रहते हैं। इस प्रकार उनकी हम पर (इंद्र) कोई कृपा नहीं है। अतएव हे देवर्षि ! आप अपने पिता श्रीब्रह्माको ही श्रीहरिका कृपापात्र समझना क्योंकि ब्रह्माजी साक्षात् भगवान् के पुत्र हैं। इंद्र बता रहे हैं कि ब्रह्माजी हमसे किस प्रकार श्रेष्ठ हैं---- श्रीब्रह्माके एक दिवसका परिमाण चार हजार देवयुग है, तथा उनकी रात्रि भी उसी प्रकार चार हजार देवयुगके समान होती है। इस प्रकार उनके एक दिन में चौदह इंद्र बदल जाते है। अतः मेरी आयु अति अल्प है। ब्रह्माजी चौदह लोकों और उनके लोकपालोंकी सृष्टि करते हैं, उनको अधिकार देते हैं, उनका पालन-पोषण करते हैं, कर्मोंके फलोंको प्रदान करते हैं और रात्रि आने पर उनका संहार करते हैं। उनके सत्यलोक में सदैव साक्षात् सहस्रशीर्षा महापुरुष मूत्तिमान होकर सदा विराजमान रहते हैं और साक्षात् यज्ञके भागको ग्रहण करके भोजन करते हैं। इस प्रकार वे वहाँ के सभी निवासियोंको आनन्द प्रदान करते हैं। किन्तु ब्रह्माजी को भगवान् नहीं समझ लेना। Hiranykashipu ने ऐसी गलती करी। *कथा____ __हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से अमर होने का वर मांगा। इसी प्रकार ब्रह्मांड में असंख्य ब्रह्माजी है।