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प्रस्तावना : होलिका दहन हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जो होली से एक दिन पहले मनाया जाता है। पांडेयपुर में भी इस पर्व को बड़े उत्साह, श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। पौराणिक कथा : होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी राजा था, जो स्वयं को भगवान मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान था, परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। तभी से होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है। पांडेयपुर में उत्सव का स्वरूप : पांडेयपुर में इस दिन लोग मिलकर लकड़ी, उपले और सूखी टहनियाँ इकट्ठा करते हैं। शाम के समय मोहल्ले या गाँव के किसी खुले स्थान पर होलिका सजाई जाती है। विधि-विधान से पूजा की जाती है और फिर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। लोग होलिका की परिक्रमा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। बच्चे और युवा गीत गाते हैं और वातावरण आनंदमय हो जाता है। सामाजिक महत्व : यह पर्व समाज में एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है। सभी लोग मिल-जुलकर इस त्योहार को मनाते हैं, जिससे आपसी प्रेम और सहयोग की भावना मजबूत होती है। उपसंहार : इस प्रकार पांडेयपुर में होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सत्य और अच्छाई की हमेशा विजय होती है।