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🌌 मुक्ति चाहिए किसे? — अष्टावक्र का मौन प्रश्न हर इंसान किसी न किसी रूप में मुक्ति चाहता है— दुख से, डर से, तनाव से, जन्म-मरण से। लेकिन अष्टावक्र जी इस पूरी खोज पर एक ही मौन प्रश्न रख देते हैं— “मुक्ति चाहिए किसे?” यह प्रश्न साधारण नहीं है। यह सीधे उस “मैं” की ओर इशारा करता है जो खुद को बंधा हुआ मान बैठा है। 🔥 बंधन और मुक्ति का भ्रम अष्टावक्र कहते हैं— जब तक तुम मानते हो कि तुम बंधे हो, तब तक मुक्ति की तलाश चलती रहेगी। पर यदि बंधन ही एक कल्पना है, तो मुक्ति किसे मिलेगी? यही प्रश्न साधक को भीतर तक हिला देता है। 🧠 ‘मैं’ — सबसे सूक्ष्म जेल हम कहते हैं— “मैं दुखी हूँ” “मैं अज्ञानी हूँ” “मुझे मुक्त होना है” अष्टावक्र बताते हैं कि यही ‘मैं’ सबसे गहरी कैद है। जिस दिन यह ‘मैं’ देखा गया, उसी दिन मुक्ति की ज़रूरत भी गिर जाती है। 🌪️ साधना क्यों थका देती है? जब मुक्ति एक लक्ष्य बन जाती है, तो यात्रा कभी पूरी नहीं होती। अष्टावक्र कहते हैं— मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं, कोई अनुभव नहीं, बल्कि एक भ्रम का अंत है। 🌸 अष्टावक्र का मौन संदेश अष्टावक्र उत्तर नहीं देते, वह प्रश्न देकर मौन हो जाते हैं। अगर इस प्रश्न पर सच में ठहर जाया जाए— तो मन शांत हो जाता है। यही मौन ही उनका असली उपदेश है। ✨ यह वीडियो किसके लिए है? ✔ जो मुक्ति की खोज में थक चुका है ✔ जो “मैं” के भ्रम को समझना चाहता है ✔ जो अष्टावक्र गीता के गूढ़ सत्य जानना चाहता है ✔ जो भीतर की शांति की ओर मुड़ना चाहता है 🔔 जुड़े रहें अगर यह विचार आपको छू गया हो, तो वीडियो को Like, Share और Subscribe ज़रूर करें। ऐसे ही गहरे, झकझोर देने वाले अष्टावक्र-विचार आगे भी मिलते रहेंगे 🙏