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प्रश्न: भगवान, अनुकंपा करें और गहराई से समझाएं: ‘प्रतिरोध न करें’। मैं एक व्यापारी हूं और विश्व का एक समाजसेवी सदस्य हूं। अगर आप मुझे कोई युक्ति दें तो मैं बहुत अनुगृहीत होऊंगा। मैंने आपकी ‘बुक ऑफ दि सीक्रेट्स’ के पांचवें भाग का एक शब्द पढ़ा है: स्वीकार-भाव। लोटू सी. छुगानी! यूं तो वो मेरी रगेजां से भी थे नजदीकतर आंसुओं की धुंध में लेकिन न पहचाने गए। वह दूर नहीं है। वह तो हमारे प्राणों से भी निकट है। वह तो हमारे चैतन्य का केंद्र है। आंसुओं की धुंध में लेकिन न पहचाने गए। पर आंखें हमारी बहुत तरह की धुंधों से घिरी हैं। आंसुओं की धुंध तो है ही, क्योंकि जीवन हमारा विषाद है। और जीवन विषाद ही होगा। उसे जाने बिना कैसा आनंद? उसे पहचाने बिना कैसा प्रकाश? उसके अभाव में अंधकार है। अंधकार अभाव का ही नाम है। अंधकार की कोई सत्ता नहीं है, कोई अस्तित्व नहीं है। रोशनी का न होना। बस दीये की गैर-मौजूदगी। दीया जला और अंधकार गया। गया कहना भी ठीक नहीं, भाषा की भूल है; क्योंकि था ही नहीं, जाएगा कहां? मिटा कहना भी ठीक नहीं; था ही नहीं तो मिटेगा कैसे? अंधकार केवल अनुपस्थिति थी। प्रकाश उपस्थित हो गया, इसलिए अब अंधकार दिखाई नहीं पड़ता। प्रकाश अनुपस्थित हो जाए, फिर अंधकार दिखाई पड़ने लगेगा। और जीवन हमारा बहुत दुखों से भरा है। हम दुख में ही जीते हैं; दुख में ही बड़े होते हैं; दुख में ही गलते हैं और मिट जाते हैं। और इस दुख के पीछे पूरे समाज का षडयंत्र है। समाज नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति आनंद को उपलब्ध हो। समाज के न्यस्त स्वार्थ तुम्हारे दुख पर ही जीते हैं। तुम दुखी हो, पीड़ित हो, परेशान हो, तो तुम पुरोहित के पास जाओगे। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, गिरजा--आनंदित व्यक्ति किसलिए जाएंगे? जो आनंदित है, वह तो जहां है वहीं मंदिर है। आनंद से बड़ा और कोई मंदिर है, कोई मस्जिद है? जो आनंदित है उसकी तो श्वास-श्वास में तीर्थ है; वह क्यों जाए काशी और क्यों जाए काबा? जो आनंदित है उसके तो प्राणों में गंगा बह रही है; वह बाहर की गंगा में क्यों स्नान करे? जो भीतर की गंगा में डुबकी लेता हो, वह बाहर की गंदी गंगा में किस कारण अपने को गंदा करे? कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए पुरोहित, पंडित, पादरी नहीं चाहते कि आदमी आनंदित हो। उनका सारा व्यवसाय तुम्हारे दुख पर निर्भर है। तुम दुखी हो तो तुम उनके चरण गहते हो। तुम्हारा दुख मिट जाए, उनकी जरूरत ही समाप्त हो जाती है। बीमार आदमी चिकित्सक के पास जाएगा, जाना पड़ेगा। और जो स्वस्थ है वह किसलिए जाए? चिकित्सक की अंतर्भावना तो यही होगी, अंतर्प्रार्थना तो यही होगी कि सभी लोग स्वस्थ न हो जाएं, बीमारियां फैलती रहें। इसलिए तो जब बीमारियां फैलती हैं तो डॉक्टर कहते हैं: सीजन आ गया। ‘सीजन!’ व्यवसाय का मौका आ गया, धंधे का मौका आ गया, कमाने का समय आ गया। इधर लोग मरते हैं, उधर उनकी कमाई होती है। जो व्यक्ति आनंदित है उसके जीवन में इतना प्रकाश होगा, इतनी ज्योति होगी कि वह दो कौड़ी के राजनेताओं के पीछे नहीं चलेगा। वह क्यों किसी के पीछे चलेगा? अपनी रोशनी में अपना रास्ता खोजेगा। Key Chapters: 00:00:22 - The first question: Understanding resistance and acceptance. 00:07:00 - Becoming your own light (Be your own lamp). 00:23:46 - What is Sakshi Bhava? The secret of non-resistance. 00:40:00 - The Story of the Muddy Stream: How thoughts settle. 01:06:12 - Why the world is the ultimate practice ground (Sadhana). 01:23:40 - The true meaning of Ajapa Jaap. #oshohindi #osho #hindispiritual #oshodiscourse #lifetruth #oshorajneesh #meditationhindi #dhyan #meditation