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संछिप्त परिचय (खड़िया जनजातीय नृत्य) खड़िया, मध्य भारत की एक जनजाति है। इनकी भाषा खड़िया आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार के समूह में आती है। जनसंख्या की दृष्टि से मुंडा संताली, मुंडारी और हो के बाद खड़िया का स्थान है। खड़िया आदिवासियों का निवास मध्य भारत के पठारी भाग में है, जहाँ ऊँची पहाड़ियाँ, घने जंगल और पहाड़ी नदियाँ तथा झरने हैं। इन पहाड़ों की तराइयों में, जंगलों के बीच समतल भागों और ढलानों में इनकी घनी आबादी है। इनके साथ आदिवासियों के अतिरिक्त कुछ दूसरी सादान जातियाँ तुरी, चीक बड़ाईक, लोहरा, कुम्हार, घाँसी, गोंड, भोगता आदि भी बसी हुई हैं। झारखण्ड के सिंहभूम, सिमडेगा, लोहरदगा, राँची और गुमला जिलों में अधिक हैं l झारखण्ड से सिमडेगा जिला में खड़िया समाज के लोग रहते हैं l खड़िया समुदाय का धर्म और दर्शन, आग्नेय कुल की अन्य जातियों के धर्म और दर्शन की तरह ही जटिल नहीं है। इनका धर्म और विश्वास प्रकृति पर आधरित है, जो सदान धर्म का अंग है। मुण्डा, हो, संथाल आदि की तरह ही यह जाति भी सूर्य को शत्ति और जीवन का मूल स्रोत मानती है। सूर्य के उज्जवल रंग को पवित्रता का प्रतीक मानते हैं। शक्ति का प्रतीक सूर्य ‘पोनो मोसोर’ कहलाता है। मुण्डा सूर्य को ‘'सिंगी’' मात्रा न कहकर ‘सिंगबोंगा’ कहते है। कुडुख ‘'बिड़ीनाद’' या ‘'धर्मेस'’ कहते हैं । खड़िया में सिर्फ ‘'बेड़ो'’ कहते हैं। चन्द्रमा को सूर्य की पत्नी ‘'बेड़ोडय'’ कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में धान बोने के बाद वर्षा ऋतु के मध्य से अनेक त्योहार आरम्भ हो जाते हैं। इन त्योहारों में रोनोल (रोपनी), गुडलू जोओडेम (गोंदली नवाखानी) गोडअ जोओडेम (गोड़ा नवाखानी), कदलेटा, करम, बंदई मुख्य हैं। सितम्बर माह के प्रथम पक्ष से अक्टूबर के प्रथम पक्ष तक गोंदली और गोड़ा नवाखानी मनाए जाते हैं। प्रत्येक नवाखानी में नवान्न ग्रहण किया जाता है। पूरे घर की सफाई होती है। बंदई कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। किन्तु वास्तव में कार्तिक का चाँद जिस दिन दिखाई देता है उसी दिन से त्योहार आरम्भ हो जाता है। चाँद दिखाई देता है उस दिन भैंसों के चर के आने के बाद तपान गोलङ (पूजा के लिए विशेष रूप से तैयार किया हुआ हँड़िया) से उनका पैर धेया जाता है। गोशाले में पहले से ही गोबर से लीप कर जगह निश्चित रहती है। वहाँ सूअर को अरवा चावल चराया जाता है। जिस वक्त सूअर अरवा चावल चरता होता है, घर का स्वामी हाथ उठा-उठा कर ‘गोरेया डुबोओ’ से निवेदन करता है कि उसके पशुओं को किसी तरह की हानि न हो। पूजा के बाद भैंसों के शरीर में घी या कुजरी का तेल लगाया जाता है। इसे ‘भैंस चुमान’ कहते हैं। भैंस चुमान तीन वर्षों के अन्तराल में होता है। जब पूर्णिमा आता है तब गाय-बैलों का त्योहार ‘बन्दई’ मनाया जाता है। भाषा परिवार के अनुसार खड़िया भाषा भारत के आग्नेय कुल के मुंडा वर्ग में आती है। इसी वर्ग में संताली, हो, मुंडारी आदि जनजातीय भाषाएँ भी आती हैं। खड़िया भाषा ध्वनि प्रधान भाषा है। उच्चारण-प्रधान होने के कारण कई ध्वनियों का संकेत लिखित शब्दों में नहीं मिलता है। इस कारण बोलने और लिखने के शब्दों में मेल नहीं खाता है। इसका दूसरा कारण है कि इसकी अपनी लिपि नहीं है। लिखने के लिए देवनागरी लिपि का सहारा लिया जाता है। देवनागरी लिपि सभी लिपियों से अधिक वैज्ञानिक होने के बावजूद आग्नेय परिवार की भाषाओं को पूर्णतः प्रकट नहीं कर सकती। खड़िया के साथ भी ऐसी ही बात है। खड़िया जनजातीय नृत्य खड़िया नृत्य सांस्कृतिक दृस्टि से इनका पृथक अस्तित्व है | इनके नृत्य संगीत सालो भर हर मौसम और अवसर विशेष के अनुरूप चलते रहते है | इनके नृत्य में भी सामूहिकता की प्रकृति विधमान है | एक साथ गाँव- घर के सारे रिशते-नाते नृत्य संगीत के मधुरते से आ जुड़ते हैं। खड़िया समाज में भी महिलाएँ कभी एक कतार में हाथों में हाथ जोड़ कर तो कभी पृथक होकर नृत्य करती हैं l एक से अधिक पंक्तियों में आबद्ध होकर नृत्य करना इनकी शैली है। पुरुष नर्तक इनसे आ जुड़ते हैं l पुरुष नर्तक स्वतंत्र रूप से भी नृत्य करते है, मादर, नगाड़े, ढोल ठेचका, आदि इनके भी प्रिय वाद्य हैं l पुरुष वर्ग के बिना नृत्य अधुरा है सभी प्रकार के नृत्य में पुरुषों का विशेष योगदान रहता है मान्यता के अनुशार नृत्य करते समय पुरुषों के द्वारा ही वाद्ययंत्र बजाय जाता है l खड़िया जनजातीय समुदाय का प्रमुख नृत्य हैं -हरियो, किनभर, हल्का, कुझदिङ्ग, जतरा, डीय, जदुरा, जेठ लहसुआ, लुहार, अगहन, लहसुआ, जेठवाड़ी, बूढी करम, जेठचारी, ठोयलो, जेठचारी अंगनाई, चैतं-वैषा ठरियो। चैत-वैशाख लहसुआ, ढोलकी सयलो आदि। इस प्रकार, इन शैलियों के अध्ययन से यही सिद्ध होता है कि सचमुच झारखण्ड में बोलना संगीत और है चलना ही नृत्य है। खड़िया जनजातीय पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोलक मांडर नगाड़ा ठेच्का मुरली इत्यादि पारंपरिक वेशभूषा मोटिया साड़ी, तुलोंग, साया जाकिट, गंजी, बंडी, फीता, हसली, कचिया माला, रगड़ माला, चंदवा आदि पहन कर नृत्य किया करते है l इस प्रस्तुति में हमारे द्वारा बहुत ही कम समय में सईलो, करम, जदुर और लह्सुवा नृत्य शैलियों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है l