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[20/02, 10:01] Dr. Aashish Gupta: बरेली दंगों में हथियार सप्लाई करने वाला अंतर्राज्यीय गिरोह बेनकाब, दो गिरफ्तार 5 पिस्टल, 38 कारतूस बरामद: दंगों से जुड़ा अवैध असलाह नेटवर्क उजागर दंगों की साजिश का खुलासा! बहेड़ी पुलिस ने पकड़ा हथियार सप्लायर गैंग मोबाइल वीडियो से खुला राज: टेस्ट फायरिंग करता दिखा गिरोह का सरगना उत्तराखंड तक फैला नेटवर्क? बरेली से अवैध हथियार तस्करी का खुलासा 🎯 2 लाइन का थंबनेल टेक्स्ट (हाई इम्पैक्ट) “दंगों का असलाह सप्लायर गिरफ्तार!” 5 पिस्टल, 38 कारतूस… बड़ा नेटवर्क बेनकाब [20/02, 10:06] Dr. Aashish Gupta: उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों और ब्राह्मण अस्मिता को लेकर नया विवाद उभर आया है। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक द्वारा अपने सरकारी आवास पर 101 बटुकों को आमंत्रित कर अंगवस्त्र भेंट, तिलक और चरण स्पर्श कर सम्मानित किए जाने के कार्यक्रम ने व्यापक सियासी बहस छेड़ दी है। समर्थक इसे सनातन परंपरा के सम्मान का प्रतीक बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे छवि-सुधार और राजनीतिक संदेश देने का प्रयास मान रहे हैं। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस आयोजन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि प्रयागराज में कथित रूप से एक बटुक के साथ हुए दुर्व्यवहार की घटना के बाद सरकार पर जो नैतिक प्रश्न उठे, उनका समाधान प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं हो सकता। उन्होंने सवाल किया कि यदि वास्तविक पीड़ित के प्रति संवेदना और न्याय का भाव है, तो सीधे उसके पास जाकर तथ्य स्पष्ट क्यों नहीं किए गए? “अपने चयन के बटुकों” को सम्मानित करना क्या राजनीतिक प्रबंधन नहीं है—यह प्रश्न उन्होंने सार्वजनिक रूप से उठाया। शंकराचार्य ने पूर्व में दिए गए 20 दिन के अल्टीमेटम का उल्लेख करते हुए कहा कि 11 मार्च को वे लखनऊ पहुंचकर स्वतंत्र जांच के आधार पर अपना निष्कर्ष सार्वजनिक करेंगे। इसी दिन गोरक्षा और धार्मिक अस्मिता के मुद्दे पर साधु-संतों व सनातनी संगठनों के साथ उपस्थिति दर्ज कराने की घोषणा भी की गई है। उनका दावा है कि सत्तारूढ़ दल के अनेक कार्यकर्ता और पदाधिकारी सरकार की मंशा को लेकर असमंजस में हैं और संवाद के लिए उनसे संपर्क कर रहे हैं। उधर, बरेली के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री, जिन्होंने नई राजनीतिक पहल की घोषणा की है, विभिन्न स्थानों पर सभाएं कर सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठा रहे हैं। इससे संकेत मिलते हैं कि ब्राह्मण नेतृत्व, धार्मिक प्रतिष्ठान और क्षेत्रीय राजनीतिक आकांक्षाओं के बीच नई समीकरण-रचना की कोशिशें तेज हो सकती हैं। समग्र परिदृश्य यह दर्शाता है कि प्रदेश में ब्राह्मण राजनीति एक बार फिर केंद्र में है। 11 मार्च को प्रस्तावित घटनाक्रम से स्पष्ट होगा कि यह विवाद प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रहता है या व्यापक राजनीतिक पुनर्संरेखण का आधार बनता है। फिलहाल, धार्मिक सम्मान बनाम राजनीतिक प्रयोजन की बहस ने सत्ता और संत समाज के संबंधों को नई कसौटी पर ला खड़ा किया है