У нас вы можете посмотреть бесплатно "तुम्हारे विपदाएं, बीमार-दुःखी होते, दिवाले निकालते- सभी तुम्हारा अपना पास्ट का कर्म"। (13/02/1964) или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
गीत- लौट गया गम का जमाना.. ओम् शांति। "जबकि रावण का राज्य है, जिस रावण के राज्य को ये मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं"। "रावण का राज्य किसको कहा जाता है"? "राम का राज्य किसको कहा जाता है"? मनुष्य में इतनी भी बुद्धि न रही है जानने की। सिर्फ "बाप ही आ करके समझाते हैं"। किनको समझाते हैं? "बच्चों को", जिनको अभी समझ पड़ती है कि "गम" कब होता है? और "खुशी" कब होती है? उसको भी कहा जाता है "अस्थाई"। "इस रावण राज्य में गम भी है खुशी भी है"। "अभी-अभी देखो खुशी होगी, अभी-अभी देखो गम होगा"। अभी-अभी किसको बच्चा पैदा हुआ, अभी-अभी वो मर गया। "देखो, वही की वही खुशी, वही का वही गम"। "ये दुनिया अल्पकाल क्षणभंगुर है"। "संन्यासी लोग भी ऐसे ही कहते हैं कि सुख यहां का काग विष्टा समान है"। तो जरूर कहेंगे कि ये "दुनिया गम की है" क्योंकि वो खुद भी तो ऐसे समझाते हैं ना? "उनको मालूम तो है नहीं कि सदा सुख, गम का नाम-निशान भी नहीं, वो तो होता ही है रामराज्य कहो या सतयुग कहो या वैकुंठ में कहो"। "तुम बच्चों को अभी मालूम हुआ है की बरोबर, यह रात है और बरोबर रात दुःख की ही होती है" क्योंकि "इसको कहा जाता है रावण की रात"। "रावण जब आते हैं तो रात शुरू हो जाती है, भक्ति शुरू हो जाती है, विकार शुरू हो जाते हैं"। "अभी तुम बच्चों को तो ये मालूम है कि हम सदा सुख में रहने, सदा खुशी में रहने के लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं"। बच्चे ये भी जानते हैं बाप आया ही है इसलिए समझाने के लिए कि बच्चे, भविष्य के लिए तुम प्रयत्न करो, पुरुषार्थ करो। "अब बाप राज तो बहुत सहज बताते हैं और तो बाबा कुछ नहीं कहते हैं"। "और तो बाबा में कोई आशाएं नहीं रखनी हैं इनमें बाप में या टीचर में"। बच्चों को मालूम नहीं है की बेहद के बाप से क्या मिलता है? बाप आ करके बताते हैं। दुनिया नहीं जानती है की ईश्वर से भी कुछ मिलता है। वो समझते- "ईश्वर से सुख भी मिलता है, दुःख भी मिलता है"। "ईश्वर सुख भी देते हैं, दुःख भी देते हैं"। परंतु अभी बच्चे यह समझ गए हैं कि "ईश्वर तो सदा के लिए सुख देते हैं"। और "कहते भी हैं बच्चों को की बच्चे, सुख के लिए श्रीमत पर प्रयत्न करो", क्योंकि "मैं आया ही हुआ हूँ बच्चों को रास्ता बताने"। कहां का? "मूलवतन का और विष्णुपुरी का या सुखधाम का और उस रास्ते पर बच्चों को चलना है"। बच्चों को अपने गृहस्थ व्यवहार में क्या झंझट आते हैं। "झंझट है ही है सभी बच्चों को"। "इन झंझटों में तो सभी मनुष्य हैं, गरीब भी हैं तो साहूकार भी हैं"। "बाप कहते- मैं तो सीधा-सूधा रास्ता बताने आया हुआ हूँ, जो चाहो तो मुक्तिधाम का रास्ता ले लो, सो भी बहुत सहज बताता हूँ"। बाकी "तुम्हारे पास जो विपदाएं आती रहती हैं, बीमार पड़ते हो, दुःखी होते हो, दिवाले निकालते हो, तो ये तो है सभी तुम्हारा अपना पास्ट का कर्म"। वो "कर्म" का हिसाब-किताब तो बच्चों को भोगना ही है। बाप कहते हैं- इनसे मेरा कोई ताल्लुक नहीं है। "ये तो तुम्हारे पाप किए हुए हैं या इस समय में भी कोई ऐसे पाप करते हो, इसलिए तुमको दुःख भोगना पड़ता है"। "बाप कहते हैं- मैं तो आया हूँ इन बच्चों को समझाने के लिए कि बच्चे, अभी बाप को याद करो क्योंकि वापस जाना है"। अभी और तो कुछ नहीं कहते हैं। "जब घर में जा करके झगड़ते हो, कुछ करते हो, ये तुम्हारे कर्म ठहरे"। "बाप कहते हैं की नहीं, हमने झगड़ने करने में बहुत आयु गंवाई, जन्म-जन्मांतर गंवाए हैं"। "अब तो बाप बिल्कुल ही सीधा, भोला-भाला; देखो, कहा भी जाता है बाप भोलानाथ"। बच्चों को रास्ता बहुत सहज बताते हैं कि बच्चे, "एक तो मुझे याद करो"। "कोई भी प्रकार से मुझे याद करो और भी करो क्योंकि बाप जानते हैं कि स्त्रियों का पुरुषों में, पुरुषों का स्त्रियों में मोह भी तो बहुत रहता है ना? ये संबंध भी तो है ना? "तो इन संबंधों से छुटकारा पाना यह बच्चों का काम है"। "बाप सिर्फ रास्ता बताते हैं की बच्चे- अगर तुमको मेरे से वर्सा लेना है तो एक तो तुमको पवित्र बनना है"। वो रास्ता बता देते हैं कि कैसे पवित्र बनना है? "योग में रहना है और विकार में नहीं जाना है"। "अभी अगर तुम्हारे से कोई लड़ाई होती है, तो ये तो तुम्हारे कर्म का हिसाब-किताब है, तो तुम्हारे से लड़ते रहेंगे"। बाकी "तुम पवित्र रहो, इसके लिए कभी भी कोई गवर्नमेंट भी तुमको कुछ नहीं कह सकती है"। "बच्चियां कहती, लिखती हैं- हम मार खाती हैं, वो घर का बंधन है"। वो तो बाप समझाते रहते हैं कोई जानवर तो नहीं हो जो कोई ने तुमको रस्सी से बांधा हुआ है। इसमें तो बहुत "बहादुरी" चाहिए। बिल्कुल ही "बहादुरी" चाहिए। "बाप समझाते रहते- बच्चे जाओ, कोई भी तकलीफ हो तुमको कोई तकलीफ देता है, तो गवर्नमेंट के ऑफिसरों को पकड़ो। ये तुम लोगों का काम है। बाप तो रास्ता बताते हैं। बाकी वो बंधन से छूटो ये तुम बच्चों का काम है। "तुमको कोई भी हालत में गृहस्थ-व्यवहार में पवित्र रहना है और योग में रहना है"। "बाप की याद में रहना है, पवित्र रहना है"। "अभी पवित्रता का क्वेश्चन ही भारी होता है, जिसके लिए मनुष्य कहते हैं यह तो बड़ा मुश्किल है" क्योंकि यह शिक्षा और कोई ने दी नहीं है ना? "संन्यासी तो यह शिक्षा नहीं देते हैं कि गृहस्थ-व्यवहार में रहकर के कमल-फूल के समान रहो"। भले कोई ब्रह्मचारी रहते हों। देखो, कितने संन्यासी बाहर में रहते हैं, परंतु नहीं, ये तो कायदा ही है गृहस्थ-व्यवहार में रहते हुए। देखो, बच्चों को भी कहते हैं, बच्चियों को भी कहते- "तुम वहां अपने गृहस्थ व्यवहार में रहकर के कमल-फूल के समान पवित्र रहो"। "ऐसे कन्याओं को नहीं कहेंगे"। "वो तो गृहस्थ-व्यवहार में हैं नहीं"। "वो तो गृहस्थी बनी ही नहीं हैं"। बिल्कुल ही सहज है कि "तुम गृहस्थ-व्यवहार में न जा करके, पवित्र ही रहो, जैसे पवित्र हो"। अभी तुमको कोई ऐसा है नहीं कि पवित्र रहो और कोई तुमको फांसी चढ़ाए। ऐसे नहीं तुमको अपवित्र जरूर बनना है। यह भी कोई कायदा नहीं है। इसमें तो बड़ी हिम्मत चाहिए। (13/02/1964)