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ताप्ती नदी के किनारे बसा प्राचीन कंटारेश्वर महादेव मंदिर | सूरत गुजरात | 4K | दर्शन 🙏 скачать в хорошем качестве

ताप्ती नदी के किनारे बसा प्राचीन कंटारेश्वर महादेव मंदिर | सूरत गुजरात | 4K | दर्शन 🙏 2 года назад

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ताप्ती नदी के किनारे बसा प्राचीन कंटारेश्वर महादेव मंदिर | सूरत गुजरात | 4K | दर्शन 🙏

श्रेय: लेखक: रमन द्विवेदी भक्तों नमस्कार! प्रणाम और हार्दिक अभिनन्दन! भक्तों आज हम अपने यात्रा कार्यक्रम में आपको डायमंड नगरी सूरत स्थित एक ऐसे प्राचीन मंदिर का दर्शन करवाने जा रहे हैं। जहाँ देवाधिदेव महादेव का स्वयम्भू रूप श्री कंटारेश्वर महादेव विराजमान हैं। ये स्थान प्राचीन काल में कपिल मुनि का तपस्थल रहा है ।और यहाँ पर सूर्यकुंड नामक एक जलधारा है। जिसे अपने वनवास काल में भगवान् श्रीराम ने ऋषियों के आग्रह पर पृथ्वी पर बाण मार कर प्रकट किया था। मंदिर के बारे में: भक्तों कंटारेश्वर महादेव मंदिर भारत के गुजरात राज्य के सूरत महानगर के कतारगाम इलाके में नदी के तट पर स्थित है। ताप्ती नदी के तट पर भगवान शिव के कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं। उन मंदिरों में कंटारेश्वर महादेव मंदिर को सबसे पुराना माना जाता है। कंटारेश्वर महादेव की प्राकट्य कथा: भक्तों श्री कंटारेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर कंटारेश्वर महादेव का मंदिर है, प्राचीन काल में यहाँ घना जंगल था। यह जंगल स्थानीय गायों के लिए चारागाह था। जहाँ आस पास ग्वाले अपनी गायों को चराने लाया करते थे। यहाँ चरने आनेवाली गायों में एक गाय ऐसी थी। जिसके मंदिर वाले स्थान पर पहुँचते ही स्तन से स्वतः दूध निकलने लगता था। शाम को घर पहुँचने पर जब उस गाय का मालिक उसे दुहने जाता तो गाय के स्तन से दूध नहीं निकलता। इससे गाय के मालिक को लगने लगा कि शायद कोई मेरी गाय का दूध चोरी करता है। उसने गाय चरानेवाले ग्वाले से इस बात की शिकायत की। तब ग्वाले ने गाय का पीछा करना शुरू किया। पीछा करने के बाद उसने देखा कि जंगल पहुंचकर वो गाय अन्य गायों से अलग हो गयी। जैसे ही वो एक विशेष स्थान पर पहुंची तो उसके स्तन से दूध की धार बहने लगी। ये देखकर ग्वाले को संदेह हुआ कि यहाँ कुछ है!!! वह अपने संदेह का निराकरण करने हेतु उस स्थान पर गया। वह स्थान पूर्णतः घास और पत्तों से ढंका था। अतः उसे यह पता नहीं चल पा रहा था कि पत्तों के नीचे क्या है? यह जानने की चेष्टा से वह इधर उधर देखने लगा। अचानक उसका पैर एक विशेष स्थान पर पड़ गया। पैर पढ़ते ही वहां से एक भयंकर और अलौकिक आवाज़ आई। जिसे सुनकर वह गाय भड़क गयी और ग्वाला गिर गया। ग्वाले के पैर से वहां जमा पत्तों का ढेर हट गया और वहां एक दिव्य शिवलिंग दिखने लगा । यह किस्सा ग्वाले ने जाकर स्थानीय लोगों को बताया। जिसके बाद सभी स्थानीय लोग यहाँ पहुंचकर पूजा अर्चना करने लगे। आज वही शिवलिंग कंटारेश्वर महादेव के नाम से इस स्थान पर विराजमान हैं। कंटारेश्वर महादेव नाम क्यों?? भक्तों कंटारेश्वर महादेव नाम होने का प्रमुख कारण यह है कि प्राचीन काल में यह स्थान कंटीले (काँटों वाले) पेड़ों का जंगल था। काँटों को गुजराती में कंटार कहा जाता है। कंटारवन में स्थित होने के कारण यहाँ विराजमान भगवान् महादेव के शिवलिंग को कंटारेश्वर महादेव कहा जाता है। मंदिर की स्थापना: भक्तों कंटारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माणकाल और निर्माता का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन लोगों का मानना है कि यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना मंदिर है। कंटारेश्वर महादेव पांच भाई: भक्तों मान्यता है कि कंटारेश्वर महादेव पांच भाई हैं। पाँचों के नाम भी देवनागरी अक्षर “क” से प्रारम्भ होते हैं। पहले भाई सूरत में कंटारेश्वर, दूसरे बाडोली में केदारेश्वर, तीसरे बालपुर में कदम्बेश्वर, चौथे कंणाव में कणकेश्वर और पांचवें धौला पीठ नवसारी में कपिलेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं। कहा जाता कि श्रावण मास में एक दिन पाँचों भाई यहाँ एकत्र होते हैं। शिव आराधना महापर्व श्रावण में भक्तों द्वारा की गयी पूजा यहाँ त्वरित फलीभूत होती है।इसीलिये श्रावण में यहाँ श्रद्धालुओं और भक्तों की अत्यधिक भीड़ होती है। गर्भगृह: भक्तों कंटारेश्वर महादेव के प्रमुख मंदिर के गर्भगृह में भगवान् हिरण्यगर्भ अर्थात कंटारेश्वर महादेव का दिव्य स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। और उन्ही के समीप माता पार्वती की प्रतिमा भी विराजमान है. मंदिर परिसर: भक्तों, कांटारेश्वर महादेव मंदिर का परिसर बहुत ही सुंदर एवं शान्ति का अनुभूति देने वाला है. यहाँ कांटारेश्वर महादेव के अतिरिक्त महादेव के प्रिय सेवक एवं वाहन नंदी जी की प्रतिमा विराजमान है. इन्ही के साथ एक ओर भगवान् गणेश, ब्रह्मा जी, सूर्यनारायण भगवान्, हनुमान जी, विष्णु जी एवं कपिल मुनि जी की प्रतिमा भी विराजमान है. मंदिर की दीवारों में ऊपर की ओर भोलेनाथ की लीला की सुंदर चित्रकारी की गयी है. जो दिखने में अत्यधिक मनमोहक प्रतीत होती है. परिसर में भोलेनाथ का एक और छोटा सा मंदिर है. जहाँ भक्त महादेव का दर्शन पूजन करते हैं. मंदिर का शिखर एवं सम्पूर्ण मंदिर की वास्तुकला किसी का भी मन मोह लेने वाली प्रतीत होती है. यह वास्तुकला मंदिर की भव्यता एवं पौराणिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है. सूर्य कुंड: भक्तों श्री कंटारेश्वर महादेव मंदिर के पास दाहिनी ओर एक कुआं है ये कुआं, सूर्यकुंड के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि सूर्य की प्रथम किरण इस कुंड में पड़ती है। इस कुंड के बारे में कहा जाता है कि इस कुंड को भगवान् श्रीराम ने कपिल मुनि के आग्रह पर पृथ्वी पर अपने बाण का प्रहार करके बनाया था। इस कुंड से जुड़ी एक कथा के अनुसार- त्रेता युग में यहाँ घना जंगल था। जो तपस्वियों को रुचिकर था। उस समय कपिल मुनि कई ऋषियों मुनियों के साथ यहाँ तपस्या कर रहे थे। वनवास के दौरान एक दिन भगवान् श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ पधारे। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि तिलक किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. #devotional #temple #kantareshwarmahadevmandir #hinduism #gujarat #tilak #darshan #travel #vlogs

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