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“बन्ना बन्नी गीत। सोने चांदी का भाव।” एक नया मांगलिक लोकगीत है, जो राजस्थान की पारंपरिक बना-बन्नी परंपरा पर आधारित है। इस गीत में ग्रामीण महिलाएँ (बन्नी समूह) सोने-चांदी के बढ़ते भाव और महंगाई को हंसी-ठिठोली, व्यंग्य और लोकभाव के साथ प्रस्तुत करती हैं। यह गीत विवाह, मांगलिक अवसरों और पारिवारिक समारोहों में गाए जाने वाले पारंपरिक Manglik Geet की शैली में रचा गया है। गीत की भाषा बागड़ी और सरल हिंदी का सुंदर मिश्रण है, जिसमें पायल, कमरबंद, नथ, हंसली और तिमणिया जैसे राजस्थानी गहनों के माध्यम से नारी मन की भावना व्यक्त होती है। अगर आपको New Banna Banni Song, Manglik Geet, और राजस्थानी लोक संगीत पसंद है, तो वीडियो को Like करें, Share करें और Channel को Subscribe करें। Song Writer: राकेश खुडिया Lyrics & Concept: राकेश खुडिया Banna Banni Geet, Sone Chandi Ro Bhav, Manglik Geet, New Banna Banni Song, Rajasthani Manglik Geet, Rajasthani Folk Song, Banna Banni Folk, Bagdi Lok Geet, Rajasthani Wedding Song, Desi Manglik Song, Rural Women Folk Song, Indian Folk Wedding Song, Traditional Rajasthani Geet, #BannaBanniGeet #SoneChandiRoBhav #ManglikGeet #NewBannaBanniSong #RajasthaniFolk #RajasthaniWeddingSong #BagdiLokGeet #DesiManglikGeet #RuralWomenSong #IndianFolkMusic Lirics: ओऽऽ… हाय रे महंगाई… बन्नी रो दिल बोल पड़्यो… चांदी तो चांद पर चढ़गी रे बन्ना, कांई पैरूं अब पायल कंगना? हाथ सूना, कलाई रो साज गयो, मन म कमरबंद री रहगी रे बन्ना! चांदी तो चांद पर चढ़गी रे बन्ना, मन म कमरबंद री रहगी रे बन्ना! ब्याह के दिनां जो सपणा देख्या, आज वो सपणा भारी पड़ गयो पायल बोले तो बोले कैसे, चांदी रो भाव ही ऊपर चढ़ गयो नथ बिना चेहरो सूनो लागे, हंसली बिना गला भी डरे लोगां पूछै – “क्या बात है?” बन्नी भीतर-भीतर ही जरे चांदी तो चांद पर चढ़गी रे बन्ना, मन म कमरबंद री रहगी रे बन्ना! सोनू सुरगा म चढ़ग्यो बन्ना, रेट सुनां तो पसीनो आवै तिमणिया, हंसली, रानीहार, सब मन ही मन में साजे-भावै गले में तिमणिया सपना बनगी, हंसली फोटो तक ही सीमित बन्नी बोले – “किस रो दोष?” बन्ना बोले – “महंगाई ही निष्ठुर!” सोनू सुरगा म चढ़ग्यो बन्ना, मन म तिमणिया री रहगी बन्ना! अरे बन्नी तू नाराज ना हो, मैं भी तो मजबूर घणो घर, खेती, खर्चा, महंगाई, जेब में बस सन्नाटो सणो पर वादा है एक दिन बन्नी, पायल भी आवै, कमरबंद भी तिमणिया-हंसली संग में लावां, तू हंस दे, बाकी सब ठीक ही चांदी तो चांद पर चढ़गी रे बन्ना, मन म कमरबंद री रहगी रे बन्ना! एक चूड़ी में बजट टूटै, एक नथ में महीनो जावै बन्ना बोले – “सादा रह ले,” बन्नी बोले – “सादा सब नै ना भावै!” पायल बोले तो घर बोले, कमरबंद बोले तो मान बढ़ै पर भावां की मार ऐसी, साज सगळो मन में ही गढ़ै चांदी चांद पर चढ़गी रे बन्ना, साज मनां में ही रह ग्या बन्ना! आज नहीं तो काल सही, दिन बदलसी, भाव उतरसी बन्नियां गीतां में दुख बोलै, हंसी-हंसी महंगाई हरसी चांदी चांद पर, सोनो सुरगा, बन्ना-बन्नी बीच में लटका कमरबंद, पायल, नथ, हंसली, गीतां में उतरो मन रो फटक, ओऽऽ… बन्ना… ओऽऽ… बन्नी…