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"सोमेश्वर मंदिर, पाषाण पुणे"I "ओम् नमो शिवाए" अर्थात् "मैं आत्मा, शिव परमात्मा को नमन करता हूं"l "ओम् चांटिंग" और "ओम् नमो शिवाए" अर्थात् "मैं आत्मा, शिव परमात्मा को नमन करता हूं"l (23/02/2026) ओम् शांति। "मीठे बच्चे- यह संगमयुग है चढ़ती कला का युग", "इसमें सभी का भला होता है"। इसलिए "कहा जाता- चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला''। "बाप समझाते हैं- मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ", श्रीकृष्ण सिखाता नहीं"। "श्रीकृष्ण तो सतयुग का प्रिंस है"। "स्वर्ग में जो सूर्यवंशी-चंद्रवंशी देवताएं थे उनमें कोई ज्ञान नहीं"। "ज्ञान तो प्राय:लोप हो जाएगा"। "ज्ञान है ही सद्गति के लिए"। "सतयुग में दुर्गति में कोई होता ही नहीं"। "वह है ही सतयुग, अभी है कलियुग"। "भारत में पहले सूर्यवंशी 8 जन्म फिर चंद्रवंशी 12 जन्म"। "यह एक जन्म अभी तुम्हारा सबसे अच्छा जन्म है"। "तुम हो प्रजापिता ब्रह्मा मुख वंशावली"। "यह है सर्वोत्तम धर्म"। "देवता धर्म सर्वोत्तम धर्म नहीं कहेंगे"। "ब्राह्मण धर्म सबसे ऊंच है"। "देवताएं तो प्रालब्ध भोगते हैं"। अच्छा। (23/02/2026) गीत- ओम् नमो शिवाए.. ओम् शांति। "रूहानी बाप जिसकी महिमा सुनी वह बैठ बच्चों को पाठ पढ़ाते हैं"। यह "पाठशाला" है ना? तुम सब यहां पाठ पढ़ रहे हो "टीचर" से। "यह है सुप्रीम टीचर, जिसको परमपिता भी कहा जाता है"। "परमपिता रूहानी बाप को ही कहा जाता है"। "लौकिक बाप को कभी परमपिता नहीं कहेंगे"। तुम कहेंगे अभी हम "पारलौकिक बाप" के पास बैठे हैं। कोई बैठे हैं, कोई मेहमान बन आते हैं। "तुम समझते हो- हम बेहद के बाप पास बैठे हैं, वर्सा लेने के लिए"। तो अंदर में कितनी खुशी होनी चाहिए? मनुष्य तो बिचारे चिल्लाते रहते हैं। इस समय दुनिया में सब कहते हैं- दुनिया में शांति हो। यह तो बिचारों को पता नहीं, शांति क्या वस्तु है? "ज्ञान का सागर, शांति का सागर बाप ही शांति स्थापन करने वाला है"। "निराकारी दुनिया में तो शांति ही है"। यहां चिल्लाते हैं कि दुनिया में शांति कैसे हो? "अब नई दुनिया सतयुग में तो शांति थी जबकि एक धर्म था"। नई दुनिया को कहते हैं "पैराडाइज़, देवताओं की दुनिया"। शास्त्रों में जहां-तहां अशांति की बातें लिख दी हैं। दिखाते हैं- द्वापर में कंस था, फिर हिरण्यकश्यप को सतयुग में दिखाते हैं, त्रेता में रावण का हंगामा..। सब जगह अशांति दिखा दी है। मनुष्य बिचारे कितना घोर अंधियारे में हैं? पुकारते भी हैं बेहद के बाप को। "जब गॉड फादर आए तब वही आकर शांति स्थापन करे"। "गॉड" को बिचारे जानते ही नहीं। "शांति होती ही है नई दुनिया में"। "पुरानी दुनिया में होती नहीं"। "नई दुनिया स्थापन करने वाला तो बाप ही है"। उनको ही बुलाते हैं कि आकर "पीस, शांति" स्थापन करो। "आर्य समाजी" भी गाते हैं "शांति देवा"। "बाप कहते हैं- पहले है पवित्रता"। अभी तुम "पवित्र" बन रहे हो। "वहां पवित्रता भी है, पीस भी है, हेल्थ-वेल्थ सब है"। "धन बिगर तो मनुष्य उदास हो जाते हैं"। "तुम यहां आते हो इन लक्ष्मी-नारायण जैसा धनवान बनने"। यह "विश्व के मालिक" थे ना? तुम आए हो "विश्व का मालिक" बनने। परंतु वह दिमाग सबका नंबरवार है। "बाबा ने कहा था- जब प्रभात फेरी निकालते हो", तो साथ में "लक्ष्मी-नारायण" का चित्र जरूर उठाओ। ऐसी युक्ति रचो। अभी बच्चों की बुद्धि "पारसबुद्धि" बनने की है। "इस समय अजुन तमोप्रधान से रजो तक गए हैं"। "अभी सतो, सतोप्रधान तक जाना है"। वह ताकत अभी नहीं है। याद में रहते नहीं हैं। "योगबल" की बहुत कमी है। फट से "सतोप्रधान" नहीं बन सकते हैं। यह जो गायन है- "सेकंड में जीवनमुक्ति", वह तो ठीक है। "तुम ब्राह्मण बने हो, तो जीवनमुक्त बन ही गए, फिर जीवनमुक्ति में भी सर्वोत्तम, मध्यम, कनिष्ट होते हैं"। जो बाप का बनते हैं, तो "जीवनमुक्ति" मिलती जरूर है। "भल बाप का बन फिर बाप को छोड़ देते हैं तो भी जीवनमुक्ति जरूर मिलेगी"। स्वर्ग में झाडू लगाने वाला बन जाएंगे। स्वर्ग में तो जाएंगे। बाकी पद कम मिल जाता। "बाप अविनाशी ज्ञान देते हैं, उसका कभी विनाश नहीं होता है"। "बच्चों के अंदर में खुशी के ढोल बजने चाहिए"। "यह हाय-हाय होने के बाद फिर वाह-वाह होनी है"। "तुम अभी ईश्वरीय संतान हो फिर बनेंगे दैवी संतान"। "इस समय तुम्हारी यह जीवन हीरे तुल्य है"। तुम भारत की सर्विस कर भारत को पीसफुल बनाते हो। "वहां पवित्रता, सुख, शांति सब रहती है"। "यह ब्राह्मण जीवन तुम्हारा देवताओं से भी ऊंच है"। "अभी तुम रचता बाप को और सृष्टि चक्र को जानते हो"। कहते हैं- यह त्योहार आदि जो भी हैं परंपरा से चले आते हैं। परंतु कब से? यह कोई नहीं जानते। "समझते हैं- जबसे सृष्टि शुरू हुई, रावण को जलाना आदि भी परंपरा से चला आता है"। "सतयुग में तो रावण होता नहीं"। "वहां कोई भी दु:खी नहीं है इसलिए गॉड को भी याद नहीं करते"। "यहां सब गॉड को याद करते रहते"। "समझते हैं- गॉड ही विश्व में शांति करेंगे, इसलिए कहते हैं आकर रहम करो"। "हमको दु:ख से लिबरेट करो"। "बच्चे ही बाप को बुलाते हैं क्योंकि बच्चों ने ही सुख देखा है"। "बाप कहते हैं- तुमको पवित्र बनाकर साथ ले चलेंगे"। "जो पवित्र नहीं बनेंगे वह तो सज़ा खाएंगे"। "इसमें मन्सा, वाचा, कर्मणा पवित्र रहना है"। "मन्सा" भी बड़ी अच्छी चाहिए। इतनी मेहनत करनी है जो पिछाड़ी में मन्सा में कोई व्यर्थ ख्याल न आए। "एक बाप के सिवाए कोई भी याद न आए "। "बाप समझाते हैं- अभी मन्सा तक तो आएंगे, जब तक कर्मातीत अवस्था हो"। "हनुमान मिसल अडोल बनो, उसमें ही तो बड़ी मेहनत चाहिए"। "जो आज्ञाकारी, वफादार, सपूत बच्चे होते हैं बाप का प्यार भी उन पर जास्ती रहता है"। "5 विकारों पर जीत न पाने वाले इतने प्यारे लग न सकें"। तुम बच्चे जानते हो- हम कल्प-कल्प बाप से यह वर्सा लेते हैं, तो कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए? यह भी जानते हो स्थापना तो जरूर होनी है। (26/12/1967)