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जौला: इतिहास, संघर्ष और भाईचारे की एक अमर दास्तान प्रस्तावना भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला, जो अपनी उपजाऊ भूमि और मेहनकश किसानों के लिए जाना जाता है, इसी जिले की बुढाना तहसील में एक ऐसा गाँव स्थित है, जो न केवल अपने आकार में विशाल है, बल्कि अपने ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में भी विराट है। इस गाँव का नाम है—जौला। जौला महज एक गाँव नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर है। यहाँ की मिट्टी में 1857 की क्रान्ति के शहीदों का लहू मिला है, तो हवाओं में कौमी एकता और भाईचारे की खुशबू है। 2011 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि यहाँ लगभग 3450 परिवार निवास करते हैं और गाँव की कुल आबादी 24,655 है, जिसमें 12,974 पुरुष और 11,681 महिलाएँ शामिल हैं। इतनी बड़ी आबादी के साथ यह गाँव एक छोटे कस्बे जैसा प्रतीत होता है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी ग्रामीण परिवेश और सादगी से जुड़ी हुई है। 1857 की क्रान्ति: वीरता और बलिदान का इतिहास जौला गाँव का इतिहास शौर्य और पराक्रम की स्याही से लिखा गया है। जब 1857 में भारत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी पहली स्वतंत्रता संग्राम की बिगुल फूँकी थी, तब जौला गाँव भी पीछे नहीं रहा। इस गाँव के वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। इतिहास गवाह है कि यहाँ के बाशिंदों ने अंग्रेजों से डटकर लोहा लिया। उस दौर में, जब ब्रिटिश सरकार का क्रूर दमन चक्र चल रहा था, जौला के 200 बहादुर सपूतों ने अपनी जान की परवाह किए बिना संघर्ष किया और शहादत का जाम पिया। इन 200 लोगों की आहुति ने इस गाँव की मिट्टी को इतना पवित्र बना दिया कि आज भी यहाँ की पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों के उस बलिदान को याद कर गर्व महसूस करती हैं। यह बलिदान न केवल जौला के लिए बल्कि पूरे मुजफ्फरनगर और देश के लिए स्वाभिमान का प्रतीक है। धार्मिक सद्भाव और गंगा-जमुनी तहजीब धार्मिक नजरिए से देखें तो जौला भारतीय धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की एक जीती-जागती मिसाल है। यहाँ अलग-अलग धर्मों के लोग सदियों से एक साथ, एक परिवार की तरह रहते आए हैं। गाँव में दशकों पुराने इस्लामिया मदरसे हैं, जहाँ दीनी तालीम के साथ-साथ इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाता है। यहाँ की प्राचीन मस्जिदें जहाँ इबादत का केंद्र हैं, वहीं गाँव में स्थित दिगम्बर जैन प्राचीन मन्दिर यहाँ की सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता का प्रमाण है। एक ही गाँव में अजान की गूँज और मंदिर की घंटियों की आवाज का एक साथ होना, भारत की उस 'अनेकता में एकता' की तस्वीर को पेश करता है, जिस पर हमें नाज है। यहाँ हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते हैं, त्यौहार मिल-जुल कर मनाते हैं और यही इस गाँव की असली ताकत है। बाबा गुलाम मौहम्मद जौला: एक युगपुरुष जौला गाँव की बात हो और बाबा गुलाम मौहम्मद जौला का जिक्र न हो, यह संभव नहीं। वे इस गाँव के ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के एक कद्दावर किसान नेता थे। बाबा गुलाम मौहम्मद ने अपना पूरा जीवन किसानों के हक की लड़ाई और समाज में भाईचारा कायम करने में समर्पित कर दिया। वे भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। उनकी आवाज में वो दम था कि शासन-प्रशासन भी उनकी बात सुनने को मजबूर हो जाता था। लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान सामाजिक सौहार्द के क्षेत्र में था। वे हमेशा से ही यह मानते थे कि किसान की कोई जाति या धर्म नहीं होता, किसान सिर्फ किसान होता है। उनके इन्ही विचारों ने जौला को हमेशा एकजुट रखा। मुजफ्फरनगर 2013: नफरत की आंधी में अमन का दीया साल 2013 में जब मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाके साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहे थे, तब जौला गाँव ने संयम और समझदारी की एक नई इबारत लिखी। चारों तरफ नफरत का माहौल था, लेकिन जौला में इंसानियत जिंदा थी। इस दौरान बाबा गुलाम मौहम्मद जौला और गाँव के अन्य मौजीज लोगों ने आगे आकर मोर्चा संभाला। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके गाँव और आसपास के इलाके में किसी भी प्रकार की हिंसा न भड़के। उन्होंने दंगा पीड़ितों को सहारा दिया, डरे हुए लोगों को हिम्मत दी और भाईचारे की मिसाल पेश की। इस अमन को कायम रखने में गाँव के कई प्रमुख व्यक्तियों ने रात-दिन एक कर दिया। इनमें मुख्य रूप से मोमीन बाबा, इरफान राणा, अब्दुल जब्बार, हाफिज जमील, मुफ्ती आजाद, मौलवी मुनफैत, ताहिर ठेकेदार, हाजी जमशेद, रामनिवास शर्मा, जयपाल कश्यप, कालू खाँ, फारूख मास्टर, अस्फाक नेता, हुसैन राणा, प्रवेश मास्टर, आलोक जैन, रहीश खाकसार, जुल्लु ठेकेदार और शब्बीर कल्लन शामिल थे। इन सभी ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर इंसानियत का धर्म निभाया। रामनिवास शर्मा और आलोक जैन जैसे हिन्दू भाइयों ने मुस्लिम समाज के साथ मिलकर, और हाफिज जमील व मुफ्ती आजाद जैसे मुस्लिम विद्वानों ने हिन्दू भाइयों के साथ मिलकर यह संदेश दिया कि सियासत चाहे जितनी भी नफरत फैला ले, जौला के दिलों को नहीं बाँट सकती। यह सूची उन लोगों की है जिन्होंने साबित कर दिया कि असली नेता वही है जो संकट के समय समाज को जोड़े रखे। सामाजिक चेतना और युवाओं की भूमिका आज का जौला न केवल अपने अतीत पर गर्व करता है, बल्कि अपने भविष्य को लेकर भी सजग है। गाँव में सामाजिक संगठनों की सक्रियता यह बताती है कि यहाँ के युवा बदलाव के वाहक बन रहे हैं। जौला यूथ क्लब और द मशाल फाऊण्डेशन जैसी संस्थाएँ गाँव में शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही हैं। ये संगठन युवाओं को नशे से दूर रखने, गरीब बच्चों की मदद करने और गाँव की साफ-सफाई व विकास कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। लेखक व संकलन: जीशान अहमद (जौला)