У нас вы можете посмотреть бесплатно पाता हूँ जहाँ ख़ुद में वहदत उसे कहते हैं| ग़ौसी शाह (1893–1954) | Rare Sufi Qawwali или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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यह सूफ़ी कलाम हज़रत ग़ौसी शाह (1893–1954) का है, जो अपने समय के गहरे आध्यात्मिक चिंतक और सूफ़ी कवि माने जाते थे। उनकी शायरी में “वहदत” (एकत्व) और “कसरत” (बहुलता) का सूफ़ी दर्शन स्पष्ट झलकता है। यह कलाम इंसान और हक़ (सत्य) के बीच के आंतरिक संबंध को प्रकट करता है। जब ग़ौसी शाह कहते हैं: “मैं दोनों जहाँ में हूँ हैं दोनों जहाँ मुझ में” तो वे उस सूफ़ी सत्य की ओर संकेत करते हैं जहाँ बंदा और ब्रह्मांड अलग नहीं रहते। यह प्रस्तुति पारंपरिक सूफ़ी क़व्वाली शैली में है — हृदय से सुनें, भीतर उतरकर समझें। 🙏 अगर आपको सूफ़ी कलाम और आध्यात्मिक शायरी पसंद है, तो लाइक और सब्सक्राइब ज़रूर करें। ग़ौसी शाह (1893–1954) एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत और शायर, जिनकी रचनाओं में वहदत-उल-वजूद का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उनका कलाम आत्मचिंतन, प्रेम और आध्यात्मिक एकता की ओर मार्गदर्शन करता है। मैं दंग हूँ अपने में हैरत उसे कहते हैं पाता हूँ जहाँ ख़ुद में वहदत उसे कहते हैं कर जम्अ तू तनज़ीह-ओ-तश्बीह को ऐ सूफ़ी बतलाऊँ मैं फिर तुझ को हुज्जत उसे कहते हैं मैं दोनों जहाँ में हूँ हैं दोनों जहाँ मुझ में वहदत उसे कहते हैं कसरत उसे कहते हैं है ऐन न ख़ुद ज़ाहिर है ग़ैर न ख़ुद क़ायम हम इस को समझते हैं हिकमत इसे कहते हैं हैं जम्अ में हम और फिर हैं जम्अ से ख़ाली हम जल्वत उसे कहते हैं ख़ल्वत उसे कहते हैं क़तरा कहीं दरिया है दरिया कहीं क़तरा है जो राज़ समझते हैं क़ुदरत उसे कहते हैं मद-होशी में ला की हम ग़ौसी बहुत अच्छे थे क्या बंदा बनाया है उल्फ़त उसे कहते हैं