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स्वर विज्ञान (Swar Vigyan) मानव शरीर में श्वास-प्रश्वास के लिए नाक में दो नासिका छिद्र होते हैं— एक दाहिनी ओर और दूसरा बायीं ओर। इन दोनों नासिकाओं के माध्यम से वायु शरीर के भीतर प्रवेश करती है और बाहर निकलती है। इसी श्वास-प्रवाह को स्वर कहा जाता है। स्वर के प्रकार 👉स्वर मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं— 1. चन्द्रस्वर जब बायीं नासिका से श्वास का प्रवाह अधिक होता है, तो उसे चन्द्रस्वर कहते हैं। 2. सूर्यस्वर जब दाहिनी नासिका से श्वास का प्रवाह अधिक होता है, तो उसे सूर्यस्वर कहा जाता है। 3. सुषुम्णा स्वर जब दोनों नासिकाओं से एक साथ श्वास-प्रश्वास होता है, तो उसे सुषुम्णा स्वर कहते हैं। 👉सामान्यतः कभी चन्द्रस्वर, कभी सूर्यस्वर चलता रहता है, जबकि सुषुम्णा स्वर बहुत कम समय के लिए सक्रिय होता है। यदि हम इन स्वरों को पहचानना और नियंत्रित करना सीख लें, तो अनेक रोगों से मुक्ति और स्वस्थ जीवन संभव है। सूर्यस्वर (दाहिनी नासिका का स्वर) यह उष्ण (गरम) स्वर होता है। सर्दी, जुकाम, खाँसी, दमा, निमोनिया, अपच, गठिया, जोड़ों का दर्द, निम्न रक्तचाप, पोलियो एवं पक्षाघात में लाभकारी माना जाता है। भोजन करते समय सूर्यस्वर सक्रिय होना चाहिए। दीर्घशंका (मल-विसर्जन) के समय भी इस स्वर का चलना शुभ होता है। कठिन यात्राएँ, परिश्रम के कार्य, व्यायाम, स्नान एवं शयन के समय यह स्वर उपयोगी है। ठंडे मौसम एवं वर्षा ऋतु में सूर्यस्वर विशेष लाभ देता है। चन्द्रस्वर (बायीं नासिका का स्वर) यह शीतल (ठंडा) स्वर होता है। गर्मी, पित्तजन्य रोग, शारीरिक जलन, हृदय की धड़कन बढ़ना, घबराहट, मूत्र में जलन, उच्च रक्तचाप, थकान, शरीर की अधिक गर्मी एवं ज्वर में उपयोगी है। 👉जल एवं पेय पदार्थ चन्द्रस्वर के समय ग्रहण करने चाहिए। 👉लघुशंका (मूत्र-त्याग) के समय इस स्वर का चलना उत्तम माना जाता है। 👉यात्रा, भजन एवं साधना के समय चन्द्रस्वर अनुकूल होता है। 👉ग्रीष्म ऋतु में इस स्वर का प्रयोग लाभकारी होता है। सुषुम्णा स्वर का महत्व 👉जब दोनों नासिकाएँ समान रूप से सक्रिय हों, तब सुषुम्णा स्वर प्रवाहित होता है। यह स्वर विशेष रूप से— 👉योग 👉ध्यान 👉जप 👉भजन 👉प्रार्थना 👉अध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म और योग संबंधी क्रियाएँ सुषुम्णा स्वर में ही करनी चाहिए, तभी वे शीघ्र सिद्ध होती हैं। #mahadev #shivratri #shivparvati #shiv