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श्री भक्तमाल में भीष्म पितामह को परम सत्य और निष्काम भक्ति के शिखर के रूप में चित्रित किया गया है, जो अपने पिता की प्रसन्नता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य त्याग की अपनी 'भीष्म प्रतिज्ञा' के लिए अमर हैं। उन्हें उन बारह 'महाजनों' में गिना जाता है जो धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानते हैं, और जिन्होंने कौरवों के पक्ष में युद्ध करते हुए भी अपना हृदय सदैव भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित रखा। उनकी भक्ति इतनी सामर्थ्यवान थी कि उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए स्वयं भगवान को युद्ध में शस्त्र न उठाने की उनकी प्रतिज्ञा तोड़ने पर विवश कर दिया। अंत समय में बाणों की शय्या (शरशय्या) पर लेटे हुए उन्होंने अपनी दृष्टि और मन को श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप में लीन कर दिया और उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए मोक्ष प्राप्त किया।