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📌 वीडियो अध्याय (Chapters & Summary) 00:00 - 15:00 | शंका-समाधान: प्रमाणों की संख्या और दार्शनिक मत शंका: अर्थापत्ति (Presumption) और अनुपलब्धि (Non-perception) को अलग प्रमाण क्यों माना गया? क्या इनका अंतर्भाव अनुमान में नहीं हो सकता? समाधान: वक्ता समझाते हैं कि विभिन्न दार्शनिक (तार्किक, मीमांसक) अपने साध्य (Goal) को सिद्ध करने के लिए प्रमाणों की व्यवस्था बनाते हैं। जैसे तार्किकों को आत्मा/ईश्वर सिद्ध नहीं करना था तो उन्होंने प्रमाण कम माने, और जब सिद्ध करना पड़ा तो बढ़ा दिए। परंपरा और नियम: समाज और धर्म के नियम कैसे बनते हैं? लिखित शास्त्र और प्रचलित परंपरा में क्या अंतर है? डार्विन के विकासवाद और भारतीय परंपरा का संदर्भ। 15:00 - 30:00 | शब्द प्रमाण, परंपरा और बुद्ध की जिज्ञासा शब्द प्रमाण की आवश्यकता: व्याकरण और मीमांसक 'शब्द' को मूल प्रमाण मानते हैं। चारवाक जैसा नास्तिक भी अपने पिता का परिचय 'शब्द' (मां के वचन) से ही मानता है, प्रत्यक्ष से नहीं। बुद्ध का दृष्टांत: भगवान बुद्ध की सत्य की खोज और तत्कालीन साधना पद्धतियों की विफलता। विरोध परिहार: क्या बुद्धावतार वेद विरुद्ध था? शास्त्रों में इसका समाधान 'आसुरी व्यामोह' (Asura-Delusion) के रूप में कैसे दिया गया है। जिज्ञासा का समाधान प्रमाण बुद्धि से ही होता है। 30:00 - 45:00 | प्रत्यक्ष-अनुमान में दोष और सत्यापन (Verification) प्रमाण में दोष: प्रत्यक्ष (आँख) और अनुमान (धुआं-आग) भी गलत हो सकते हैं। उदाहरण: रज्जु-सर्प भ्रांति (रस्सी को सांप समझना) या नाइट्रोजन का धुआं। सत्यापन की समस्या: क्या ज्ञान (Knowledge) अपने आप में प्रमाण है या उसे किसी और सबूत की जरूरत है? रोचक दृष्टांत: आधार कार्ड और पैन कार्ड का वेरिफिकेशन। जब सरकार ने कहा "Self-Attestation" (स्वतः प्रमाण) ही काफी है। यह समझाने के लिए कि प्रमाण को अंततः कहीं रुकना पड़ता है। 45:00 - 01:00:00 | प्रामाण्यवाद: स्वतः और परतः (Logic vs Mimamsa) तार्किक मत (परतः प्रामाण्य): ज्ञान सही है या नहीं, यह 'प्रवृत्ति की सफलता' (Successful Action) से तय होता है। (जैसे: पानी समझकर दौड़े और प्यास बुझी तो ज्ञान सही था)। मीमांसक मत (स्वतः प्रामाण्य): ज्ञान उत्पन्न होते ही प्रमाण होता है, जब तक कि वह बाधित न हो जाए। हम हर कदम फूँक-फूँक कर तार्किक रूप से नहीं रखते, बल्कि विश्वास (स्वतः प्रमाण) पर चलते हैं। व्यावहारिक उदाहरण: इंडक्शन कुकर पर बर्तन ठंडा रहता है पर खाना पक जाता है—यहाँ 'अग्नि से बर्तन गर्म' वाला पुराना अनुमान फेल हो जाता है। 01:00:00 - 01:11:55 | वेदों का निरंकुश प्रामाण्य (Vedas as Absolute Proof) वेद का स्वतः प्रामाण्य: वेद अपौरुषेय (ईश्वर कृत) हैं और उनका विषय 'अलौकिक' है, इसलिए उनमें दोष की संभावना नहीं है। वे स्वतः प्रमाण हैं। 'स्वार्थ' में प्रामाण्य: वेद का प्रमाण उनके अपने विषय (अलौकिक/ब्रह्म) में है। उदाहरण: वेद वाक्य "ग्रावाणः प्लवन्ते" (पत्थर तैरते हैं)। यह प्रत्यक्ष विरुद्ध लग सकता है, लेकिन रामसेतु में पत्थरों का तैरना इसे सत्य सिद्ध करता है। वेद का वचन अंतिम सत्य है।