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बसंत पंचमी का त्योहार मुख्य रूप से ज्ञान, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 23 जनवरी को मनाया गया। 1. मां सरस्वती का प्राकट्य (जन्म) पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी ने महसूस किया कि संसार शांत और मूक है। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, वीणा के साथ मां सरस्वती प्रकट हुईं। उनके वीणा बजाते ही संसार में वाणी और स्वर का संचार हुआ। इसी कारण इसे 'सरस्वती जयंती' भी कहा जाता है। 2. बसंत ऋतु का आगमन यह दिन कड़ाके की ठंड की समाप्ति और बसंत ऋतु (ऋतुराज) की शुरुआत का प्रतीक है। इस समय प्रकृति खिली-खिली रहती है, खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं और चारों ओर हरियाली छा जाती है। 3. शिक्षा और ज्ञान का महत्व विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन छोटे बच्चों का 'अक्षरारंभ' (पढ़ाई की शुरुआत) और 'विद्यारंभ' संस्कार कराया जाता है। 4. पीले रंग का महत्व बसंत पंचमी पर पीला रंग प्रधान होता है क्योंकि यह शुद्धता, ऊष्मा और नई ऊर्जा का प्रतीक है। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले पकवान (जैसे केसरिया भात या बेसन के लड्डू) बनाते हैं और मां सरस्वती को पीले फूल अर्पित करते हैं। अन्य मान्यताएं: कामदेव की पूजा: प्राचीन काल में इस दिन प्रेम के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा भी की जाती थी। अबूझ मुहूर्त: इसे शादी-विवाह और नए कार्यों की शुरुआत के लिए सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है। जैन धर्म: जैन परंपरा में इस दिन आचार्य कुंदकुंद स्वामी का प्राकट्य दिवस भी मनाया जाता है।