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बैठे मारुति।चरणारबिंद। निराला।राम की शक्ति पूजा। baithe maruti। ram ki shakti puja। nirala राम की शक्ति पूजा। निराला। ram ki shakti puja।nirala। / @pathshala2047 #ram ki shaktipuja ki visheshta #ram ki shaktipuja ka saransh #ram ki shaktipuja best lines #vyakhya ram ki shaktipuja #बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द- युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक रूप, गुण-गण-अनिन्द्यय साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिणपद, दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम - धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम - नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादलय ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,- सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभय टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल, सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल बैठे वे वहीं कमल-लोचन, पर सजल नयन, व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख निश्चेतन।’’ संदर्भ- पूर्ववत्। प्रसंग-शिला पर अपने यूथपतियों से घिरे राम चिंतन में व्यस्त हैं और हनुमान उनके पैरों को निर्मल जल से तन्मय होकर धोने में लीन हैं। राम को सीता की छवि याद आती है और राम सिहर उठते हैं, फिर उनकी आँखों से अश्रु के दो बूूँद उनके चरणों पर गिरते हैं, हनुमान को भ्रम होता है कि ये मुक्ता दल हैं या आँसू । आँसू का विचार आते ही वे व्याकुल हो उठते हैं, इसी का वर्णन है। सरलार्थ एवं व्याख्या- राम साधना मध्य समरस भाव में पद्मासन की मुद्रा में बैठे हैं जिनके बाँये पैर पर दाँयी हथेली और दाहिने पैर पर बाँयी हथेली है। राम के पाद-पद्मों में बैठे हनुमान राम के चरण कमलों को निहार रहे हैं, देख रहे हैं। हनुमान को राम के वे दोनों पैर पैर न होकर सृजन एवं संहार, साकार और निराकार, अस्ति-नास्ति के ऐक्य रूप लगते हैं। जो गुण-युक्त हैं-अनिंद्य हैं। इन्हीं पद-युग्मों में सच्चिदानंद स्वरूप परम ब्रह्म का निवास देखकर हनुमान गद्गद् हो रहे हैं। राम को ब्रह्म तथा स्वयं को जीव रूप में द्विधा-विभक्त कर राम-राम का मन ही मन अजपा जाप कर रहे थे कि उसी समय राम के चरण-युग्मों पर दो अश्रु बूँद आ गिरते हैं, जिन्हें गिरते देख हनुमान को आकाश में तारादल के चमकने का भ्रम होता है। फिर विचार आता है, ये राम के चरण नहीं हैं, ये तो श्यामा के पैर हैं जिनके पैरों पर आपातित दोनों बूँद दो हीरे या दो कौस्तुभ मणि हैं, इस संदेह भाव के उदय के साथ ही उनका स्थिर मन विकल हो उठता है एकाग्रचित ध्यान टूट जाता है। दृष्टि उठाते हैं तो देखते हैं-राम तो वैसे ही बैठे हैं किन्तु उनकी आँखें सजल है। सदैव प्रफुल्लित रहनेवाला मुख निःचेतन है, विषादयुक्त व्याकुल है। पैरों पर गिरे ये दो बूँद, दो हीरे या दो कौस्तुभ मणि नहीं हैं ये तो राम की आँखों से गिरे दो अश्रु बूँद हैं, मन में यह विचार आते ही हनुमान उद्वेलित हो उठते हैं, उनकी अपार शक्ति-सागर का खिलवाड़ शुरू हो जाता है । विशेष- हनुमान की परंपरागत दास्य भक्ति का अत्यंत ही सहज रूप में चित्रण हुआ है। ‘श्यामा के शुभ’ का उल्लेख देवी के प्रति निराला की आस्था अभिव्यक्ति है। ‘चरणारविंद‘ और ‘कमल लोचन ’ में रूपक, ‘आस्ति-नास्ति’, हीरक या कौस्तुभ’ में विरोधाभास, ‘ज्यों तारादल’, ‘ये चरण नहीं राम के’ में अपह्नुति तथा ‘गद्गद्’ एवं व्याकुल-व्याकुल’ में पुनरूक्तिप्रकाश अलंकार है।