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"113 साल का इतिहास मलबे में..बागेश्वर की आखिरी चीख सुनेगा प्रशासन?" #SaveBageshwarHeritage #BageshwarDiaries #UttarakhandHeritage #HistoricalBridge #ProtestForIdentity #113YearsOld #OldBageshwar #sureshpandey #localnews31 #लोकलन्यूज31 #बागेश्वर #झूला_पुल #विरासत_बचाओ #उत्तराखंड_इतिहास #जनता_का_आक्रोश #113साल_पुराना_पुल मिट जाएगा बागेश्वर का 113 साल पुराना गौरव? विकास की मशीनें या विरासत की अंतिम सांस! बागेश्वर की पहचान, सरयू की लहरों पर साल 1913 से शान से खड़ा 'झूला पुल' अब इतिहास बनने की कगार पर है। जिस पुल ने कुली बेगार आंदोलन की गूँज सुनी, जिस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कदम पड़े, आज उसे 'विकास' के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है। नया पुल आधुनिकता की जरूरत हो सकता है, लेकिन क्या हम इतने गरीब हो गए हैं कि अपनी 113 साल पुरानी विरासत को एक कोने में सुरक्षित भी नहीं रख सकते? बागेश्वर की जनता में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों की मांग है कि इस ढांचे को संरक्षित कर एक 'धरोहर' (Heritage) के रूप में पहचान दी जाए, न कि इसे मलबे में तब्दील किया जाए। इस वीडियो में देखें: 113 साल पुराने साथी की अंतिम विदाई के मार्मिक दृश्य। क्यों इस पुल को बचाना बागेश्वर की अस्मिता के लिए जरूरी है। जनता की सरकार और निर्माण एजेंसी से बड़ी मांग। मुख्य बिंदु (Key Highlights): ऐतिहासिक महत्व: 1913 में निर्मित, गांधी जी की यादों से जुड़ा पुल। विवाद: पुराने ढांचे को संरक्षित करने के बजाय उसे तोड़ने का विरोध। सवाल: क्या विकास का मतलब अपनी जड़ों को खत्म करना है?