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“भक्त के भाव से भगवान प्रकट होते हैं” ~ दादूवाणी, विनती का अंग, भाग-२, महंत श्री बजरंगदास जी महाराज, • *भक्त की पुकार से भगवान प्रकट होते हैं~दाद... . पोख प्रतिपाल रक्षक ~ दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार । दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥३४॥ टीका ~ हे जिज्ञासु ! अन्तःकरण में विरह की आवाज से परमेश्वर को पुकारे, तो एक क्षण में ही तत्काल प्रकट हो जाते हैं । और फिर अपने जन को दुखी देखकर परमेश्वर भक्त की तुरन्त रक्षा करते हैं ॥३४॥ द्विज तिय ले मुकलाव तैं, ठग मार्यो बन जांहि । विरह वचन सुन तीय के, प्रभु आये छिण मांहि ॥ . आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार । साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥३५॥ टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! वह समर्थ परमेश्वर ! अपने अनन्य निष्कामी भक्तों की रक्षा करने को, आगे - पीछे साथ रहते हैं, और भक्तों का सब भर - भार आप उठाते हैं । ऐसे भक्तों को जो कदाचित् कभी दुःख होवे, तो भगवान अपने आपको दुखी मानते हैं । ऐसे वे दयालु सिरजनहार हैं ॥३५॥ बून्दी में बणियो भगत, रामदास जी नाम । पोट लई सिर राम जी, जग जाना सब गाँव ॥ जैमल ह्वै बाहरै चढै, नगर मेड़ते मांहि । श्रीधर के संग चोर थे, लूटण दीन्हों नांहि ॥ दृष्टान्त ~ मेड़ता के राजा जैमल जी महाराज, भगवान कृष्ण के भक्त थे । यह तीन घंटा भगवान की पूजा सेवा में रहते थे । इनकी प्रतिज्ञा थी कि उस वक्त कोई आकर मुझे कोई कुछ कहेगा, तो गोली से उड़ा दूंगा । मंडोर का ठाकुर सेना लेकर मेड़ते पर चढ़ाई कर दी । जयमल जी की माता को पता लगा । वह जाकर जयमल जी को बोली ~ आंख मीच कर क्या बैठा है, शत्रु तो नगर पर कब्जा करना चाहते हैं । उठ, नगर की रक्षा कर । जैमल जी बोले ~ मैं जिसका ध्यान करता हूँ, वही रक्षा करेगा । जा, चली जा, तूँ माता है, नहीं तो गोली से उड़ा देता । माता बोली ~ मैं भी देख लूँगी, वह कैसी रक्षा करता है ? तब भगवान कृष्ण ने जैमल जी का रूप बनाकर, घोड़े पर सवार होकर, तलवार ली । शत्रुओं से जाकर भारी युद्ध करके विजय प्राप्त कर ली । वहॉं उन शत्रुओं को एक मिल्ट्री का जवान दिखाई दे रहा था । महलों में वापिस आये और सईस को घोड़ा संभलाया । जैमल जी की तरफ जाकर, फिर अंतर्ध्यान हो गये । जैमल जी पूजा से आये और फिर दूसरा घोड़ा लेकर सेना के पास गये । मंडोर का ठाकुर बोला ~ हे जैमल ! आपके उस श्यामसुन्दर सैनिक जवान के मुझे एक दफा दर्शन और करा दे, चाहे फिर तूँ मुझे जान से मार दे । जैमल जी बोले ~ हे ठाकुर ! मेरा कोई सिपाही नहीं था । न मैंने भेजा, वह भगवान कृष्ण थे । तुम्हारे अहोभाग्य हैं, जो तुम्हें दर्शन हो गये । मैं तो उनकी पूजा में बैठा था । मुझे पता नहीं था कि प्रभु मेरे जैसे अभक्त सेवकों की भी रक्षा करते हैं । . तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ । दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥५९॥ टीका ~ हे स्वामी ! आप ऐसी कृपा करो कि तन, मन और बुद्धि प्राणी - मात्र की पवित्र हो जावें, अर्थात् पाप कर्मों से मुक्त हो जायें, फिर विषय शब्द आदि और विकारों की वह कोई बात भी नहीं करें ॥५९॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ॥ . अन्य प्रवचन वीडीयो, वाणी के दूसरे अंग को सुनने के लिए हमारे YouTube channel पर जाएँ- / @mahantbajrangdasjimaharaj