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#devidhura #bagwaal 2020 #बग्वाल मेला 2020 #devidhura mela ऐसी मान्यताएं हैं, वर्षों पहले जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तो देवी के गणों ने उनसे मुक्ति के बदले प्रतिफल के रूप में लोगों से नर बलि की मांग की। जिसके बाद स्थानीय लंगड़िया , चम्याल, गहड़वाल और वाल्किया (कुलों के लोग अपने लोगों की बलि देते थे। इतिहासकारों की मानें तो महाभारत काल में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक जाति ऐसी थी जो अश्म युद्ध (पत्थर मार युद्ध) में प्रवीण थी और इन योद्धाओं ने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। युद्ध से पहले चारों खामों के लोग अपनी टोलियों से साथ पूरे मंदिर परिसर की परिक्रमा करते हैं। ढोल-नगाड़ों का नाद, शंख-घंटों की टंकार और मां की जयकार के साथ द्योत उछलते-कूदते पूरे जोशो-खरोश के साथ खोलीखाड़-दुबाचौड़ मैदान में एक-एक कर प्रवेश करते हैं। पीली पगड़ी पहने द्योत, हाथों में छंतोले लिए जब प्रांगण में आकर प्रतिदंवदंवियों की टोह लेना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है कि मानों योद्धाओं की फौज व्यूह रचना कर रही हो। वालिक्या और लंगड़िया खाम पश्चिमी छोर से तो चम्याल और गहड़वाल पूर्वी छोर से रणभूमि में गर्जन करते नजर आते हैं। आसमां जयकारों और रणबांकुरों की ललकार से गुंजायमान हो जाता है। मंदिर के पुजारी से संकेत मिलने के बाद गहड़वाल खाम के द्योत सबसे पहले पत्थर मारते हैं। मान्यता है कि देवी को अठ्वार (अष्ठ बलि) देने से वह खुश होती हैं। लोग मन्नत पूरी होने के बाद अठ्वार में सात बकरों और एक भैंसे की बलि देते हैं। बकरों के मांस को तो लोग खा लेते हैं, लेकिन भैंसे को यूं ही छोड़ देते हैं। माँ बाराही धाम, लोहाघाट लोहाघाट-हल्द्वानी मार्ग पर लोहाघाट से लगभग 45 कि0मी की दूरी पर स्थित है। यह स्थान सुमद्रतल से लगभग 6500 फिट की ऊँचाई पर स्थित है। महाभारत में पाण्डवों के अज्ञातवास से लेकर अनेक पौराणिक धार्मिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं से जुडा हुआ है। यही प्रसिद्ध देवीधूरा मेला आोजित हुआ करता है