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प्रेमानंद जी कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में चिंता का सबसे सरल उपाय है—भगवान पर पूर्ण भरोसा और कर्तव्य में स्थिरता। मनुष्य की अधिकतर चिंताएँ भविष्य के भय, अपेक्षाओं और नियंत्रण की इच्छा से जन्म लेती हैं। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी योजना के अनुसार हो, और जब ऐसा नहीं होता तो मन अशांत हो जाता है। महाराज जी समझाते हैं कि गृहस्थी में रहते हुए यदि व्यक्ति यह मान ले कि मैं केवल कर्म करने वाला हूँ, फल देने वाला प्रभु है, तो चिंता अपने आप ढीली पड़ने लगती है। वे कहते हैं कि सुबह और शाम थोड़ी देर नाम-स्मरण कर लेना, चाहे चलते-फिरते ही क्यों न हो, मन को बहुत हल्का कर देता है। नाम में इतनी शक्ति है कि वह भीतर की घबराहट को शांत कर देता है। साथ ही, अपने परिवार के प्रति कर्तव्य निभाते समय शिकायत नहीं, बल्कि सेवा-भाव रखें। जब हम “मुझे क्या मिला” की जगह “मैं क्या दे सकता हूँ” पर आते हैं, तब मन का बोझ कम होता है। प्रेमानंद जी यह भी कहते हैं कि अनावश्यक तुलना गृहस्थ की सबसे बड़ी चिंता है। दूसरों के जीवन को देखकर अपने जीवन को छोटा मत आँको। जो मिला है, उसे प्रभु की कृपा मानकर स्वीकार करो। कृतज्ञता चिंता की दवा है। अंत में महाराज जी कहते हैं—जो व्यक्ति हर परिस्थिति में प्रभु को याद रखता है, उसके घर में समस्याएँ तो आती हैं, पर चिंता टिक नहीं पाती।