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✍️ कबीर दास जी का भजन : भँवरवा के तोरे संघवा जाई ✍️ 🌱कबीर जी इस भजन में जीवन के अंतिम पड़ाव यानी मृत्यु की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि जब मृत्यु की घड़ी आती है, तो परिवार के सदस्य और प्रियजन रोते हैं और बधाई नहीं बजती है। 📖 भजन और व्याख्या 📖 1. भँवरवा के तोरे संघवा जाई: कबीर जी कहते हैं कि हे मन! तुम्हारी जीवन यात्रा समाप्त हो रही है, तुम्हारे साथ कोई नहीं जाने वाला है। 2. आवे की बेरिया बड़ा खुश होला, दुअरा पे बाजे बधाई: जब कोई नया शिशु पैदा होता है, तो लोग खुश होते हैं और बधाई बजाते हैं। 3. जात की बेरिया बड़ा दुख होला, हंस अकेला जाई: लेकिन जब जीवन की यात्रा समाप्त होती है, तो दुख होता है और आत्मा अकेले चली जाती है। 4. डेहरी पकड़ के मेहरी रोवै, बाँह पकड़ि सग भाई: पत्नी दरवाजे की चौखट पकड़कर रोती है, और भाई बहन की बांह पकड़कर रोते हैं। 5. अंगना के बिचवा पिताजी रोवैं, बबुआ के होगे बिदाई: पिता आंगन में खड़े होकर रोते हैं, और पुत्र को विदाई दी जाती है। 6. कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह पद है निर्बानी: कबीर जी कहते हैं कि हे साधो! सुनो, यह पद निर्बानी का है, यानी यह पद वैराग्य की भावना को दर्शाता है। 7. जो ई पद अर्थ लगावे, जगत पार होइ जाई: जो कोई इस पद का अर्थ समझ लेगा, वह संसार से पार हो जाएगा। 🎯 भजन का मुख्य संदेश : इस भजन में कबीर जी कहते हैं कि जीवन अनित्य है और मृत्यु निश्चित है। इसलिए, हमें अपने जीवन को सही दिशा में ले जाना चाहिए और भगवान का स्मरण करना चाहिए। 🌱 भजन की विशेषताएं : जीवन की अनित्यता और मृत्यु की निश्चितता वैराग्य की भावना भगवान का स्मरण और जीवन की सार्थकता #निर्गुण #kabira #song #bhajankabir #कबीर #kabirmath #कबीरकीवाणी #music #दोहे #भोजपुरी #newbhajan #kahaikabirsunobhaisadho