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राजा और सात रानियां — प्रेम, ईर्ष्या, और सत्य की जीत की कहानी बहुत समय पहले एक राज्य में एक प्रतापी राजा वीरसेन का शासन था। राजा वीरसेन न्यायप्रिय, दयालु और अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनके राज्य में किसी को कोई दुख नहीं था। राजा वीरसेन ने एक-एक करके छह विवाह किए थे, परंतु उन्हें किसी भी रानी से संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। इस बात से वह बहुत दुखी रहते थे और उनकी यह चिंता पूरे राज्य में भी महसूस की जाती थी। राजा ने संतान प्राप्ति के लिए अनेकों यज्ञ, पूजा-पाठ और दान-धर्म करवाए। एक दिन, शिकार के दौरान राजा एक ऐसे गाँव से गुज़रे, जहाँ उन्होंने एक अत्यंत रूपवान और भोली-भाली लड़की को देखा, जिसका नाम ‘कामिनी’ था। कामिनी गांव के मुखिया की बेटी थी और बहुत सरल स्वभाव की थी। राजा उसके सौंदर्य और सादगी से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उसे अपनी सातवीं रानी बनाने का प्रस्ताव रखा। मुखिया में खुशी-खुशी राजा का स्वागत किया और कामिनी का विवाह राजा वीरसेन से करवा दिया। राजा ने अपनी सातवीं और सबसे छोटी रानी का नाम बदलकर ‘राजलक्ष्मी’ रखा। नई रानी राजलक्ष्मी को पाकर राजा वीरसेन बहुत प्रसन्न थे। वे अपना अधिकांश समय उन्हीं के साथ व्यतीत करने लगे, क्योंकि रानी राजलक्ष्मी बहुत ही भोली, मासूम दिल की और सरल स्वभाव की थीं। वह अपनी छह बड़ी रानियों को अपनी बड़ी बहनें मानकर उनका आदर करती थीं। लेकिन, बड़ी रानियों के मन में राजा के छोटी रानी के प्रति बढ़ते लगाव और मान-सम्मान को देखकर ईर्ष्या की आग जलने लगी। वे राजलक्ष्मी से नफरत करने लगीं और मन ही मन उनसे बदला लेने की योजनाएँ बनाने लगीं। शादी के कुछ समय बाद, राजा ने संतान प्राप्ति के लिए एक महात्मा को बुलाया। महात्मा राजा की चिंता को समझते थे। उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और उन्हें छोटी रानी राजलक्ष्मी के लिए एक विशेष फल देते हुए कहा कि इसे खाने से उन्हें सात पुत्रों की प्राप्ति होगी। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यह फल अत्यंत चमत्कारी है और इसे किसी भी कीमत पर किसी और को नहीं देना चाहिए। राजा ने वह फल सबसे छोटी रानी राजलक्ष्मी को दे दिया और महात्मा के कहे अनुसार उसे किसी को न देने की हिदायत दी। जब यह बात बड़ी रानियों को पता चली, तो उनकी ईर्ष्या और भी बढ़ गई। वे किसी भी कीमत पर राजलक्ष्मी को संतान सुख प्राप्त नहीं होने देना चाहती थीं। बड़ी रानियों ने मिलकर एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने राजलक्ष्मी से छल से वह फल छीन लिया और उसे स्वयं खा लिया। लेकिन चमत्कारी फल का असर उल्टा हुआ, और कुछ समय बाद वे केवल ईंट-पत्थर के टुकड़े ही प्रसव कर पाईं। कुछ महीनों बाद, राजा वीरसेन को एक महत्वपूर्ण युद्ध के लिए बाहर जाना पड़ा। उनके जाने के बाद, रानी राजलक्ष्मी ने गर्भ धारण किया। यह समाचार पूरे राज्य में फैल गया और चारों ओर खुशियों का माहौल छा गया। परंतु, बड़ी रानियों के तन-बदन में आग लग गई। एक रात, जब रानी राजलक्ष्मी को प्रसव पीड़ा हुई, तो बड़ी रानियों ने अपने पुराने षड्यंत्र में एक दाई को शामिल कर लिया। उन्होंने दाई को पैसे का लालच दिया और उससे कहा कि यदि रानी राजलक्ष्मी को संतान हो, तो वह उन्हें मारकर जंगल में ज़मीन में दबा दे और रानी को बताए कि उसने ईंट-पत्थर के टुकड़ों को जन्म दिया है। #beststory #moralstories #story #motivation #viral #history #khaniya #hindi #hindistories #trandingstory #viralstory #nightstory