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अर्जुनविषादयोग जीवन के उन गहरे क्षणों का चित्रण है जब मनुष्य कर्तव्य और करुणा, धर्म और मोह, साहस और संवेदना के बीच खड़ा होता है। यह प्रसंग श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का मूल विषय है, जहाँ एक महान योद्धा युद्धभूमि में खड़े-खड़े भीतर से टूटने लगता है। यह केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानव मन की सार्वकालिक स्थिति का दर्पण है। कुरुक्षेत्र की विशाल रणभूमि में शंखनाद हो चुका है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं। धूल उड़ रही है, रथों की गर्जना है, और हर ओर युद्ध का तनाव। ऐसे में जब अर्जुन अपने सारथी से कहते हैं कि रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलो ताकि वे देख सकें कि उन्हें किन-किन से युद्ध करना है, तब उन्हें अपने ही गुरु, बंधु, मित्र और रिश्तेदार दिखाई देते हैं। यही दृश्य उनके भीतर एक गहरा भावनात्मक तूफ़ान खड़ा कर देता है। अर्जुन का हृदय द्रवित हो उठता है। उनके हाथ काँपने लगते हैं, गांडीव धनुष हाथ से ढीला पड़ जाता है, शरीर शिथिल हो जाता है। वे सोचते हैं—जिस राज्य, सुख और विजय के लिए यह युद्ध है, यदि वही अपने प्रियजनों के विनाश पर आधारित हो, तो ऐसी विजय का क्या मूल्य? यहाँ अर्जुन का विषाद केवल कमजोरी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और नैतिक दुविधा का प्रतीक है। यहीं पर उनके सारथी और मार्गदर्शक श्रीकृष्ण उन्हें जीवन का गूढ़ ज्ञान देते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं; आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; और धर्म का पालन कभी-कभी कठिन निर्णयों से होकर गुजरता है। अर्जुन का विषाद इस ज्ञान का द्वार बनता है—यदि विषाद न होता, तो गीता का उपदेश भी न होता। अर्जुनविषादयोग हमें सिखाता है कि जीवन में भ्रम और दुख के क्षण भी अनमोल हो सकते हैं, क्योंकि वही हमें सत्य की खोज की ओर ले जाते हैं। जब मनुष्य रुककर प्रश्न करता है—“मैं क्या कर रहा हूँ? क्यों कर रहा हूँ?”—तभी वास्तविक समझ जन्म लेती है। आज के समय में भी, जब हम करियर, रिश्तों या नैतिक फैसलों को लेकर उलझते हैं, हम उसी मनःस्थिति से गुजरते हैं। यह प्रसंग महाभारत के महान कथानक का हिस्सा है, लेकिन इसका संदेश समय और संस्कृति से परे है। अर्जुन की तरह हम भी कई बार परिणामों के भय से अपने कर्तव्य से पीछे हटना चाहते हैं। परंतु गीता का संदेश कहता है—स्पष्टता, समत्व और निस्वार्थ कर्म ही आगे का मार्ग हैं। अर्जुनविषादयोग का एक और गहरा पक्ष है—मानवता। एक योद्धा होते हुए भी अर्जुन का हृदय करुणा से भरा है। यह दर्शाता है कि शक्ति और संवेदना साथ-साथ चल सकती हैं। वास्तविक परिपक्वता वही है जहाँ निर्णय बुद्धि से हो, पर हृदय की कोमलता बनी रहे। आज के दर्शक के लिए यह अध्याय मानसिक स्वास्थ्य का भी संदेश देता है। जब मन भारी हो, निर्णय कठिन लगें, और भविष्य धुंधला दिखे—तब संवाद, ज्ञान और आत्मचिंतन आवश्यक है। अर्जुन ने भी अपने मन की बात कही, अपने संदेह व्यक्त किए; और तभी उन्हें समाधान मिला। यह हमें सिखाता है कि प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, बल्कि विकास की शुरुआत है। अंततः, अर्जुनविषादयोग निराशा की कथा नहीं, रूपांतरण की कथा है। विषाद से विवेक, भ्रम से बोध, और मोह से मुक्ति की यात्रा यहीं से शुरू होती है। यह अध्याय बताता है कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ बाहर नहीं, भीतर लड़ी जाती हैं—और जीत भी वहीं मिलती है। अर्जुनविषादयोग का रहस्य | गीता का पहला अध्याय सरल भाषा में जब अर्जुन टूट गए युद्धभूमि में | अर्जुनविषादयोग समझें गीता ज्ञान: अर्जुन का विषाद और जीवन के सबक #अर्जुनविषादयोग, गीता अध्याय 1, #life गीता ज्ञान, कृष्ण उपदेश, #life महाभारत ज्ञान, motivation hindi, #spiritualwisdom video, #geetasarinhindi saar hindi, life lessons from gita #lifelessons #अर्जुनविषादयोग #गीता_ज्ञान #geetasaarbykrishna #spiritualmotivation #krishnavani #Mahabharat Katha #motivationhindi #BhagavadGita