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श्रीमद्भागवत पुराण, रामचरितमानस और अन्य शास्त्रों में कलयुग के बारे में एक बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति कही गई है: "कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।" इसका अर्थ है कि सतयुग में जो फल कठिन तपस्या से, त्रेता में बड़े यज्ञों से और द्वापर में विधि-विधान से की गई पूजा से मिलता था, वह कलयुग में केवल ईश्वर के नाम संकीर्तन (Naam Jaap) से ही प्राप्त हो जाता है। कलयुग में मोक्ष प्राप्ति के मुख्य मार्ग यहाँ दिए गए हैं: 1. नाम संकीर्तन (The Power of Sound) कलयुग में मन बहुत चंचल होता है, इसलिए लंबे ध्यान या कठिन योग करना सबके लिए संभव नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धा के साथ भगवान के नाम का जाप करना ही मोक्ष का सबसे सरल और प्रभावी साधन है। हरे कृष्ण महामंत्र या राम नाम का जाप इस युग के लिए विशेष फलदायी बताया गया है। 2. निष्काम कर्म (Selfless Action) बिना किसी फल की इच्छा के अपना कर्तव्य निभाना। दूसरों की सहायता करना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से पूरा करना भी ईश्वर की सेवा ही माना गया है। 3. भक्ति मार्ग (The Path of Devotion) नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन) में से किसी भी एक मार्ग को अपनाकर भक्त ईश्वर के करीब पहुँच सकता है। कलयुग में 'श्रवण' (कथा सुनना) और 'कीर्तन' (गायन) को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 4. दान और सेवा (Charity) कलयुग में 'दान' का विशेष महत्व है। भूखे को भोजन कराना, असहाय की मदद करना और निस्वार्थ भाव से जीवों की सेवा करना पापों का क्षय करता है और अंतःकरण को शुद्ध करता है। कलयुग का 'वरदान' भले ही कलयुग को दोषों का भंडार कहा गया है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसे एक अवसर भी माना जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार: जो फल सतयुग में 10 वर्ष की तपस्या से मिलता था... वही फल त्रेता में 1 वर्ष के यज्ञ से मिलता था... द्वापर में 1 महीने की पूजा से मिलता था... वह फल कलयुग में मात्र 1 दिन और रात के सच्चे नाम स्मरण से प्राप्त हो सकता है। व्यावहारिक दृष्टिकोण आज के समय में मोक्ष का अर्थ केवल जन्म-मरण के चक्र से छूटना ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति और अहंकार से मुक्ति भी है। अनुशासन, सत्य बोलना और क्रोध पर नियंत्रण रखना कलयुग में मोक्ष की पहली सीढ़ी मानी जाती है।