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भक्त शिरोमणि सूरदास का साहित्य भक्ति की पावन धारा से सिक्त व स्वासित है। प्रभु भक्ति तल्लीनता ही उनके जीवन का सार तत्त्व है। डॉ. विजयेन्द्र स्नातक के अनुसार "जनमानस को विमुग्ध कारने वाला उनका काव्य भक्ति का नवनीत है जो भवत्रस्त-विपन्न जन को स्निग्ध शान्त करता हुआ मोहन की सौन्दर्यमयी लीलाओं में लीन करने की अद्भुत शक्ति रखता है।" भक्ति के विभिन्न आचार्यों ने भक्ति के संबंध में अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए हैं जिनमें से कुछ विद्वानों के विचार व उनके द्वारा दी गई भक्ति की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं: महर्षि नारद के अनुसार भक्ति 'परम प्रेम रूपा और अमृत स्वरूपा है- "सा त्वस्मिन् परम प्रेमरूपा, अमृतस्वरूपा च" इसी प्रकार 'शाण्डिल्य भक्ति सूत्र' के अनुसार ईश्वर में परम अनुरक्ति ही भक्ति है- 'सा परानुरक्तिः ईश्वरे'। • सूरदास (M.A.) #hindi#sahitya