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आज मैं बागेश्वर धाम पहुँचा हूँ, जहाँ एक साथ 300 कन्याओं का सामूहिक विवाह कराया जा रहा है। इस आयोजन में विवाह के लिए आवश्यक घरेलू सामान, फर्नीचर, बर्तन, कपड़े और रोज़मर्रा की ज़रूरतों की चीज़ें रखी गई हैं, जिन्हें कन्याओं को उपहार के रूप में दिया जाना है। इस वीडियो में मैंने सिर्फ इस सामान को नहीं दिखाया, बल्कि यह समझने की कोशिश की है कि लोग इस पहल को किस नजर से देख रहे हैं — मदद के रूप में या दहेज के एक नए रूप के तौर पर। जब हम दहेज की बात करते हैं, तो आमतौर पर एक नकारात्मक तस्वीर सामने आती है। लेकिन यहाँ स्थिति थोड़ी अलग है। यहाँ रखा गया सामान किसी दबाव या मांग के तहत नहीं, बल्कि एक आयोजन के माध्यम से दिया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या तरीका बदलने से सोच भी बदल जाती है? इसी सवाल को लेकर मैंने वहाँ मौजूद आम लोगों से बात की — जो इस सामान को देखने आए थे, जो इस व्यवस्था से प्रभावित थे, और जो इस पर सवाल भी उठा रहे थे। इस वीडियो में आप देखेंगे कि कुछ लोग इसे गरीब परिवारों के लिए बहुत बड़ी राहत मानते हैं, क्योंकि आज के समय में बेटी की शादी एक बहुत बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी बन चुकी है। वहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं कि अगर समाज में शादी को इतना खर्चीला न बनाया जाए, तो शायद ऐसी मदद की जरूरत ही न पड़े। यानी एक ही जगह पर दो अलग-अलग सोचें साफ दिखाई देती हैं। मैंने जानबूझकर इस वीडियो में किसी एक राय को थोपने की कोशिश नहीं की। न यह साबित करने की कोशिश की कि यह पूरी तरह सही है, और न ही यह कि यह पूरी तरह गलत है। मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि जो हो रहा है, उसे जैसा है वैसा रिकॉर्ड किया जाए — और दर्शक खुद तय करें कि वे इसे कैसे देखते हैं। यह वीडियो सिर्फ शादी या सामान का नहीं है। यह वीडियो है: समाज की सोच का बेटियों की शादी को लेकर बने दबाव का और उस सिस्टम का, जहाँ कभी मदद सम्मान लगती है, तो कभी सवाल अगर आप यह वीडियो देख रहे हैं, तो खुद से एक सवाल ज़रूर पूछिए — क्या हम दहेज खत्म करना चाहते हैं, या बस उसे आसान बनाना चाहते हैं? मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहा। मैं सिर्फ कैमरा लेकर उस जगह खड़ा हूँ, जहाँ सवाल अपने आप पैदा होते हैं।