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🧔🏻♂️ आचार्य प्रशांत से मिलना चाहते हैं? लाइव सत्रों का हिस्सा बनें: https://acharyaprashant.org/hi/enquir... 📚 आचार्य प्रशांत की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं? फ्री डिलीवरी पाएँ: https://acharyaprashant.org/hi/books?... ➖➖➖➖➖➖ #acharyaprashant #आचार्यप्रशांत #BhagavadGita #InnerBattle #Suffering #अध्यात्म #spirituality वीडियो जानकारी: 16.10.2023, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा Title : युध्यस्व प्रकृति से नहीं, अहंकार से! || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2023) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।। ३.३३ ।। ~ भगवद् गीता (3.33) हिंदी अनुवाद: ज्ञानवान व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के अनुसार काम करता है, जीव अपने स्वभाव (अर्थात् प्रकृति) का ही अनुसरण करता है। ऐसी स्थिति में उपदेश या शासन-वाक्य (अर्थात् निग्रह), वो भी क्या काम आएगा तुम्हारे? काव्य: ज्ञानी निष्कामी अपार मूढ़ अचेत करे व्यापार ज्ञानी हो अज्ञानी हो चलें सब प्रकृति अनुसार इस वीडियो में आचार्य जी भगवद् गीता, अध्याय 3, श्लोक 33 की चर्चा करते हुए बताते हैं कि दुख का कारण परिस्थितियाँ या प्रकृति नहीं, बल्कि हमारा अपना अहंकार है। वे स्पष्ट करते हैं कि “युद्धस्व” का अर्थ बाहर की दुनिया से नहीं, भीतर के अहंकार से संघर्ष करना है। आचार्य जी समझाते हैं कि प्रकृति माँ है—उसे बदलने की कोशिश व्यर्थ है; बदला जा सकता है केवल स्वयं को। ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं, पर अंतर यह है कि ज्ञानी निष्काम होकर चलता है और अज्ञानी अपनी कामनाओं से बँधा रहता है। जो नहीं बदला जा सकता, उसका आदर करो; और जो सचमुच बदला जा सकता है—अपनी कामना और अहंकार—उन्हीं पर काम करो। यह वीडियो हर उस के लिए है जो जीवन की कठिनाइयों को अवसर की तरह देखना चाहता है और निष्काम कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता है। 🎧 सुनिए #आचार्यप्रशांत को Spotify पर: https://open.spotify.com/show/3f0KFwe... संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~~