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उनकी कहानी माधो सिंह भंडारी की कहानी वीरता, त्याग और सामाजिक सेवा का प्रतीक है। वह कम उम्र में ही श्रीनगर (गढ़वाल) के शाही दरबार की सेना में शामिल हो गए और अपनी वीरता के बल पर सेनाध्यक्ष बने। उन्होंने राजा महीपति शाह के साथ मिलकर गढ़वाल की उत्तरी सीमाओं को तिब्बती हमलों से सुरक्षित किया और दावा क्षेत्र में सीमा निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मलेथा की गूल की कहानी: एक बार छुट्टियों में मलेथा लौटने पर माधो सिंह को अपनी पत्नी उदीना से पता चला कि गांव में पानी की कमी के कारण खेत सूखे हैं और अच्छा भोजन उपलब्ध नहीं है। यह बात उन्हें चुभ गई। उन्होंने चंद्रभागा नदी का पानी गांव तक लाने का संकल्प लिया, जो पहाड़ों के बीच होने के कारण असंभव लगता था। माधो सिंह ने गांव वालों और विशेषज्ञों की मदद से पहाड़ में सुरंग खोदने का काम शुरू किया। पांच साल की कठिन मेहनत और छेनी, हथौड़े जैसे साधारण उपकरणों से उन्होंने यह असंभव कार्य पूरा किया। कहा जाता है कि सुरंग बनने के बाद भी पानी नहीं बह रहा था। एक किवदंती के अनुसार, उनकी कुलदेवी ने सपने में बताया कि उनके पुत्र गजेसिंह की बलि से ही पानी बहेगा। माधो सिंह ने गांव की भलाई के लिए अपने पुत्र की बलि दे दी, जिसके बाद पानी बहने लगा। इसके बाद वे कभी मलेथा नहीं लौटे और श्रीनगर लौट गए। मृत्यु: माधो सिंह की मृत्यु तिब्बत के छोटा चीनी क्षेत्र में एक भीषण युद्ध के दौरान हुई। कुछ स्रोतों के अनुसार, वे रोगग्रस्त हो गए थे, और कुछ के अनुसार युद्ध में शहीद हुए। उनकी मृत्यु ने उन्हें गढ़वाल की लोककथाओं में और भी अमर कर दिया। उत्तराखंड में उनकी छवि उत्तराखंड में माधो सिंह भंडारी को एक आदर्श योद्धा, समाजसेवी और तकनीकी कौशल के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। उनकी वीरता और बलिदान की कहानियां लोककथाओं, पंवाड़ों और मेलों में जीवित हैं। मलेथा में हर साल आयोजित होने वाला माधो सिंह भंडारी मेला उनकी स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नृत्य-नाटिकाओं के साथ मनाया जाता है। लोक पर्व इगास: उत्तराखंड का प्रसिद्ध पर्व इगास (मंगसीर बग्वाल) माधो सिंह की तिब्बती युद्ध में विजय और उनके गांव लौटने की खुशी में मनाया जाता है। शैक्षिक सम्मान: उनकी स्मृति में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय का नाम 2018 में "वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय" रखा गया। स्मारक और गूल का महत्व: मलेथा में उनकी बनाई गूल आज भी खेतों को सींचती है, हालांकि यह अब जर्जर हो चुकी है। सरकार ने इसके जीर्णोद्धार और स्मारक के सौंदर्यीकरण की घोषणा की है।