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सरस्वतीचंद्र (Episode#9) (27.04.2022) Title: Saraswatichandra (Episode #9) Writer: Govardhanram Madhavram Tripathi Direction: Seema Sharda Radio Adaptation: Sudhanshu Gupta Sound Recordist: Jaswant Singh Artists : Kedarnath, Rajesh Kamboj, V.P.Kalra, Manoj Bhatnagar, Dinesh Verma, Lalit, Lokesh, Neeraj Sharma, Amitabh Verma, Tahseem, Rajneesh Kumar Sharma, Manju Maini, Geeta Verma, Sarita Bhatia, Sadiya, Deepa Roy, Harsh Bala. (Refurbished & Presented by Vinod Kumar, Central Drama Unit, DG; AIR.) सरस्वती चंद्र : रिश्तों की नियति पर कालजयी रचना वैसे तो गुजराती साहित्य में उपन्यास का आरंभ नंदशंकर की ऐतिहासिक कृति ‘करण घेलो’ है परंतु महान उपन्यासकार गोवर्धन राम त्रिपाठी (1855-1907) द्वारा लिखित ‘सरस्वती चंद्र’ यहां बतौर एक कालजयी रचना दर्ज है और इसी से गुजराती उपन्यास का श्रीगणेश माना जाता है। 1968 में इसी उपन्यास पर आधारित नूतन और मनीष अभिनीत फिल्म को भी यथेष्ट प्रसिद्धि मिली थी जिसके चंद गीत जैसे कि ‘चंदन-सा बदन, चंचल चितवन’ व ‘फूल तुम्हें भेजा है’ भी सदाबहार साबित हुए। बाद में संजय लीला भंसाली ने इस कृति पर धारावाहिक का भी निर्माण किया था। गुजराती साहित्य में 1885-1915 को गोवर्धन युग कहा जाता है। ‘सरस्वती चंद्र’ चार खंडों का उपन्यास है और इसका पहला खंड 1887 में प्रकाशित हुआ था। अगले खंड क्रमशः 1892, 1898 और 1901 में आए। नाडियाड में 20 अक्तूबर, 1855 को जन्मे गोवर्धन राम माधवराम त्रिपाठी ने 1875 में बीए और 1883 में एलएलबी करने के बाद बंबई में 1884 से वकालत शुरू की परंतु 43 वर्ष की उम्र में यह कार्य छोड़कर वे अपने गृहनगर में जा बसे। यहीं से उनका वास्तविक लेखकीय जीवन आरंभ हुआ। साथ ही 1902 के दौरान उनकी इंडियन कांग्रेस में सक्रिय भागीदारी भी रही। वे 1905 में गुजराती साहित्य परिषद के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए थे। ‘सरस्वती चंद्र’ के अलावा गोवर्धन राम ने कई लेख और निबंध लिखे जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। उनकी उल्लेखनीय पुस्तकों में ‘स्नेहमुद्रा’, ‘लीलावती जीवनकला’, ‘नवलराम नू कवि जीवन’, ‘दयाराम नो अक्षरदेह’ आदि हैं। साबरमती आश्रम के निदेशक रहे त्रिदीप सुहृद ने ‘सरस्वती चंद्र’ का अंग्रेजी अनुवाद कर इसे विश्व पटल तक पहुंचाया। संक्षिप्त रूप में भी इस उपन्यास के कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं। ‘सरस्वती चंद्र’ मूलतः इसी नाम के प्रगतिशील, सुशिक्षित और सुसंस्कृत युवक की कहानी है जिसका जन्म बंबई में रहने वाले एक धनाढ़्य व्यवसायी लक्ष्मीनंदन के घर हुआ था। सरस्वतीचंद्र वकालत करने के बाद अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगता है परंतु उसकी मां चंद्रलक्ष्मी की मृत्यु के बाद उसके पिता द्वारा पुनर्विवाह करने के बाद घटनाक्रम में तबदीली आती है। फलस्वरूप सौतेली मां के छलकपट और उसकी उपेक्षा के कारण उसे घर त्यागने पर विवश होना पड़ता है। मां की मृत्यु के पहले ही सरस्वती चंद्र का विवाह एक अनदेखी युवती कुमुद सुंदरी से निश्चित हो चुका था। कन्या के पिता विद्याचतुर रत्नागिरी राज्य के राजा मनीराज के बुद्धिमान और ज्ञानी प्रधानमंत्री थे। दो पुत्रियों कुमुद सुंदरी, कुसुम सुंदरी और पत्नी गण सुंदरी सहित यह परिवार गुणी व सुविधा-संपन्न था। विवाह निश्चित होने के बाद सरस्वती चंद्र और कुमुद सुंदरी आपस में पत्र-व्यवहार करते हैं और आपसी सोच और गुणों में सामंजस्यता के कारण वे इन पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे को मन ही मन प्रेम करने लगते हैं परंतु सौतेली मां व पिता के मिथ्यारोपों से आहत हो जब सरस्वतीचंद्र घर छोड़कर सुवर्णपुर में रहने लगता है तो वह कुमुद सुंदरी से भी नाता तोड़ लेता है। अतः कुमुद का विवाह प्रमादधन से संपन्न होता है जिसके पिता बुद्धिधन सुवर्णपुर के प्रधानमंत्री पद पर निगाहें टिकाए हुए थे। बुद्धिधन शातिर दिमाग का राजनीतिक पैंतरेबाज था। वह सुवर्णपुर के शासक जद सिंह का तख्ता पलटकर अपने राजपूत मित्र भूप सिंह को उस पद पर आसीन कर देता है और स्वयं प्रधानमंत्री बन जाता है। सरस्वती चंद्र इसी महल में नवीनचंद्र के नाम से रहता है और वहां की राजनीतिक गतिविधियों पर निगाह रखता है। इसी क्रम में कई बार उसकी मुलाकात घर की बहू कुमुद सुंदरी से होती है और उनमें एक-दूसरे के प्रति पुनः प्रेम जागृत होता है परंतु बदनामी के डर से सरस्वतीचंद्र एक दिन बैलगाड़ी पर मनोहरपुरी की राह हो लेता है। संयोग से कुमुद भी पालकी पर अपनी मां से मिलने उसी रास्ते जा रही थी। वन में उन पर आक्रमण होता है जिसमें सरस्वती चंद्र बुरी तरह घायल हो जाता है जबकि कुमुद एक कुएं में छलांग लगा देती है। बाद में सरस्वती को कुछ संन्यासी उठाकर पहाड़ी पर स्थित अपने आश्रम में ले जाते हैं जहां विष्णुदास से प्रभावित होकर वह वहीं रहने लगता है। उधर, कुमुद सुंदरी को भी संन्यासिनियों का एक दल बचा लेता है और वह भी उसी आश्रम में आ पहुंचती है। वहां सरस्वती और कुमुद के अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और संन्यासियों के प्रयास व दोनों के परिवारों की सहायता से उनका पुनर्मिलन होता है .