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पंक्ति: काहे भरमत डोलै रे मनवा, काहे भरमत डोलै। विस्तृत भाव: कबीर दास जी हमारे चंचल मन को संबोधित करते हुए पूछते हैं कि हे मनुष्य! तू इस संसार में भटक क्यों रहा है? तू सुख की तलाश में यहाँ-वहाँ दौड़ रहा है, लेकिन तुझे यह नहीं पता कि तू जिस मृग-तृष्णा के पीछे है, वह तुझे कभी शांति नहीं देगी। यह मन की अशांति ही दुखों का कारण है। 🌀🧭 पंक्ति: झूठी माया झूठा जियरा, विष क्यों अमृत में घोलै। विस्तृत भाव: यह संसार जिसे हम देख रहे हैं, वह 'माया' है यानी एक भ्रम है। यहाँ का प्रेम और जीव-जगत सब नश्वर है। कबीर कहते हैं कि तेरा जीवन अमृत के समान अनमोल था, जिसे तूने ईश्वर की भक्ति में लगाना था, लेकिन तूने इसमें सांसारिक वासनाओं और बुराइयों का विष घोल दिया है। 🍯🐍 2. धन-दौलत की व्यर्थता पंक्ति: महल अटारी खूब चनाये, दौलत जोरी भारी। विस्तृत भाव: मनुष्य जीवन भर कड़ी मेहनत करके ऊंचे-ऊंचे महल खड़ा करता है, ऐशो-आराम के साधन जुटाता है और तिजोरियां भर-भर कर धन इकट्ठा करता है। उसे लगता है कि यह संपत्ति उसे सुरक्षा देगी। 🏰💰 पंक्ति: हंस उड़े जब इस पिंजर से, धरी रहे सब ठारी। विस्तृत भाव: लेकिन सत्य यह है कि यह शरीर मिट्टी का एक 'पिंजरा' है और प्राण एक 'हंस' (पक्षी) की तरह हैं। जिस दिन यह प्राण-रूपी पक्षी उड़ जाएगा, तेरा यह सुंदर शरीर और तेरी जमा की हुई सारी दौलत यहीं धरी की धरी रह जाएगी। तू यहाँ से खाली हाथ ही विदा होगा। 🕊️🍂 3. रिश्तों का स्वार्थ पंक्ति: कुटुंब कबीला स्वारथ साथी, झूठा यह संसारा। विस्तृत भाव: कबीर कड़वा सच बोलते हैं कि जिसे तू अपना परिवार, कुनबा और सगे-संबंधी कहता है, वे सब 'स्वार्थ' के धागे से बंधे हैं। जब तक तेरा उनसे स्वार्थ सिद्ध होता है, वे तेरे साथ हैं। यह संसार एक मेला है जहाँ सब अपने लाभ के लिए जुड़े हैं। 👨👩👧👦 वैराग्य का यह संदेश रिश्तों की असलियत दिखाता है। पंक्ति: अंत समय जब आवे तेरा, कोउ न होवन हारा। विस्त訳 भाव: जब मृत्यु की घड़ी करीब आएगी और यमराज का बुलावा आएगा, तब न तेरा धन काम आएगा और न ही तेरा परिवार। उस कठिन घड़ी में तुझे अकेले ही यात्रा करनी होगी; कोई भी तेरा दुःख बांटने या साथ चलने वाला नहीं होगा। ⏳🚫 4. जीवन का दुरुपयोग और पश्चाताप पंक्ति: बालपन सब खेल गंवायो, जोबन नींद भर सोयो। विस्तृत भाव: इंसान अपनी पूरी उम्र व्यर्थ की बातों में खो देता है। बचपन नासमझी और खेल-कूद में बीत गया, और जब जवानी आई तो वह आलस्य, अहंकार और भोग-विलास की गहरी नींद में सो गया। उसने कभी आत्म-ज्ञान की कोशिश ही नहीं की। 🧸😴 पंक्ति: श्वेत भये जब केश तुम्हारे, बैठ किनारे रोयो। विस्तृत भाव: अब जब बुढ़ापा आ गया है, बाल सफेद हो गए हैं और शरीर ने साथ देना छोड़ दिया है, तब तुझे अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है। अब तू जीवन की ढलती शाम को देखकर पछता रहा है और आंसू बहा रहा है कि काश समय रहते कुछ सार्थक किया होता। 👨🦳😢 5. मुक्ति का मार्ग पंक्ति: छोड़ दे मूरख 'मैं और मेरा', कर ले प्रभु से प्रीती। विस्तृत भाव: कबीर सलाह देते हैं कि हे मूर्ख इंसान! अभी भी समय है। इस 'अहंकार' (मैं) और 'ममता' (मेरा) के बंधन को तोड़ दे। यह 'अहम' ही तुझे परमात्मा से दूर रखता है। इस झूठे मोह को छोड़कर उस अविनाशी परमात्मा से सच्चा प्रेम कर, जो हमेशा तेरे साथ है। 🕉️❤️ पंक्ति: कहत कबीर सुनो भई साधो, यही जगत की रीती। विस्तृत भाव: अंत में कबीर कहते हैं कि हे सज्जनों! कान खोलकर सुन लो, आदि काल से इस संसार का यही नियम (रीत) रहा है। यहाँ जो आया है वह जाएगा, और जो दृश्य है वह मिट जाएगा। इसलिए केवल सत्य (ईश्वर) की शरण में जाना ही एकमात्र समाधान है। 🗣️📜 निष्कर्ष: यह भजन हमें याद दिलाता है कि हम इस पृथ्वी पर किराएदार की तरह हैं। हमें सामान (माया) से ज्यादा मकान मालिक (परमात्मा) को याद रखना चाहिए। ❤️ अगर आपको यह भजन पसंद आया हो तो Like 👍, Share 🔄 और Subscribe 🔔 ज़रूर करें। आपके एक क्लिक से हमें और भक्ति-संदेश साझा करने की प्रेरणा मिलती है। ✨ #KabirDas #SantKabir #KabirBhajan #KabirSangeet #KabirKeDohe #KabirKiVani #BhaktiSangeet #IndianBhajan #SpiritualMusic #MeditativeMusic #DivineMusic #KabirKeShlok #KabirKeVichar #Bhakti #MysticPoet #KabirWisdom #KabirQuotes #SantKabirJi #KabirMeditation #SoulfulMusic #IndianDevotional #BhaktiBhajan #KabirInspirations #SpiritualJourney #Nirgun #nirgunbhajan #NirgunBhajanKabirSaheb #KabirSaheb