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अब गुमनाम है…सोनीपत का यह शहीद| Independence of India | Sonipat Libaspur Village Udmi Ram | #local18 #Udmiram #Libaspurvillage #sonipatnews #haryananews नितिन आंतिल/सोनीपत: अंग्रेज़ी हुकूमत से भारत को आज़ाद कराने के लिए न जाने कितने ही वीरों ने शहाद दी, लेकिन इनमें से बहुत कम को इतिहास में जगह मिली. ऐसे अनगिनत शहीद हैं, जो देश पर हंसते-हंसते कुर्बान हो गए लेकिन आज की पीढ़ी उनके बारे में नहीं जानती या फिर बहुत ही कम लोग इनके बलिदान के बारे में जानते हैं. कुल मिलाकर हमारे इन बहादुर देशभक्त वीरों को जो सम्मान, पहचान मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली. इतिहासकारों ने इनके साथ न्याय नहीं किया. ऐसे ही एक गुमनाम शहीद थे, हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव लिबासपुर के महान क्रांतिकारी उदमी राम, जिनकी रगों में देशभक्ति बहती थी. 1857 में उदमी राम लिबासपुर गांव के नंबरदार थे. यह गांव लिबासपुर, दिल्ली के नजदीक सोनीपत राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है. इसी मार्ग से उस दौरान बड़ी संख्या में अंग्रेज अधिकारी गुजरते थे. उदमी राम के नेतृत्व में गुलाब सिंह, जसराम, रामजस सहजराम, रतिया जैसे लगभग 22 युवा क्रांतिकारियों का एक संगठन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध काम करता था. इस संगठन के युवा क्रांतिकारी भूमिगत होकर अपने पारंपरिक हथियारों मसलन, लाठी, जेली, गंडासी, कुल्हाड़ी, फरसे से यहां से गुजरने वाले अंग्रेज अफसरों पर धावा बोलते थे और उन्हें मौत के घाट उतारकर गहरी खाई और झाड़ियों में फेंक देते थे. इसी क्रम में उदमी राम ने साथियों के साथ अफसर पर घात लगाकर हमला बोल दिया और उस अंग्रेज अफसर को मौत के घाट उतार दिया. जिसपर किया भरोसा, उसी ने दिया धोखा अंग्रेज अफसर के साथ उनकी पत्नी भी थीं. भारतीय संस्कृति के वीर स्तम्भ उदमी राम ने एक महिला पर हाथ उठाना पाप समझा और काफी सोच-विचार कर उस अंग्रेज महिला को लिबासपुर के पड़ोसी गांव भालगढ़ में एक ब्राह्मणी के घर बड़ी मर्यादा के साथ सुरक्षित पहुंचा दिया और बाई को उसकी पूरी देखरेख करने की जिम्मेदारी सौंपी. लेकिन बाद में अंग्रेज महिला ने ब्राह्मणी से कहा कि अगर वह उसे पानीपत के अंग्रेजी कैंप तक किसी तरह पहुंचा दे तो उसे मुंह मांगा इनाम दिलवाएगी. उसने झट से अंग्रेज महिला की मदद करना स्वीकार कर लिया और रातों-रात उस अंग्रेज महिला को पानीपत के अंग्रेजी कैम्प में पहुंचा दिया. कैम्प में पहुंचकर अंग्रेज महिला ने सभी गोपनीय जानकारियां अंग्रेजों को दे दी और यह भी कहा कि विद्रोह में सबसे अधिक भागीदारी लिबासपुर गांव ने की है और उसका नेता उदमीराम है. 35 दिन मौत से लड़ी जंग अंग्रेजों ने गांव पर हमला बोल दिया और राई में पीपल के पेड़ पर लोहे की कीलों से टांगकर क्रांतिवीर उदमी राम और उनकी पत्नी रत्नी देवी को तिल-तिल करके तड़पाया गया. कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी ने पेड़ पर कीलों से लटकते-लटकते ही जान दे दी. क्रांतिवीर उदमी राम ने 35 दिन तक मौत से जंग लड़ी और 35वें दिन 27 जून, 1858 को भारत मां का यह लाल इस देश व देशवासियों को हमेशा-हमेशा के लिए आजीवन ऋणी बनाकर चिर-निद्रा में सो गया.