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दियारा के राजा का महल|Diyara Riyasat| रहस्यों से भरा राज महल|Sultanpur| दियारा का राज महल सुलतानपुर#diyrasultanpur#diyrariyasat #diyramahal#historyofsultanpur#Phillies#MLB#Mets#Cleveland Guardians#SSC#Indian airforce day#jaipur pink panthers#ssc.nic.in#new zealand vs Pakistan# ___________________________________ दोस्तों ,ऐतिहासिक दृष्टि से जनपद सुलतानपुर का अतीत अत्यंत गौरवशाली और महिमामंडित रहा है । पुरातात्विक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा औध्योगिक दृष्टि से सुलतानपुर का अपना विशिष्ट स्थान हैइस भूमि के अधिपतियों की एक और महत्वपूर्ण शाखा राज साह का घराना था। राज साह के तीन बेटे, ईश्री सिंह, चक्रसेन सिंह और रुप चंद थे। ईश्री सिंह से नौ पीढ़ियों के बाद बिजय चंद आए, जिनके तीन बेटे थे। हरकरन देव, जीत राय और जिव नारायन। हरकरन देव नानेमाउ तालुकदार के पूर्वज थे, जीत राय के वंशज मेओपुर दहला, मेओपुर धौरुआ और भदैया के मालिक थे, और जिव नारायन के उत्तराधिकारी दियरा के राजा थे।जिव नारायन के चौथे वंशज ने गोमती में राजाओं के छः उपनिवेशों में से पहले का नेतृत्व किया और नदी के तट पर दियरा में खुद को स्थापित किया। यह घराना सुलतानपुर के बचगोटीस की मुख्य शाखाओं में से एक बन गया। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बाबू माधो सिंह, जिव नारायन के वंशज में ग्यारहवें स्थान पर, जिस संपत्ति के शासक थे उसमें 101 गांव शामिल थे। बाबू माधो सिंह जिन्हें सफल राजा के रूप में याद किया जाता है और जिन्होंने अपनी संपत्ति का सफल प्रबंधन किया, की मृत्यु 1823 में हुई थी। उनकी विधवा ठकुराईन दारियाव कुंवर, एक सबसे उल्लेखनीय महिला थी जिन्होंने कष्ट और उथलपुथल के वाबजूद न केवल बहादुरी से अपना खुद का प्रबंध किया अपितु उन्होंने अपने पति की तुलना में अपने जीवनकाल में और भी सम्पति को जोड़ा था। उत्तराधिकार की सीधी रेखा ठकुराईन के पति बाबू माधो सिंह की मौत के साथ खत्म हो गई थी। अगला पुरुष संपार्श्विक उत्तराधिकारी बाबू रुस्तम साह था, जिसे ठकुराईन नापसंद करती थी। बाबू रुस्तम साह उस समय के नाज़ीम महाराजा मान सिंह की सेवा में थे और ठकुराईन को पकड़ने में उनकी मदद की और उनके पक्ष में ठकुराईन को एक समझौता लिखना पड़ा। ये स्वाभिमानी महिला इस बात से काफी दुखी हुई और कुछ महीनों उपरांत उनकी मृत्यु हो गई। रुस्तम साह को नाजिम द्वारा संपत्ति का अधिकार दिया गया था। रुस्तम साह को बाद में पता चला कि नाजिम की सहायत किये जाने में उनके इरादे ठीक नहीं थे। एक युद्ध के उपरांत रुस्तम नाजिम को मारने वाला था लेकिन एक पंडित की सलाह पर कि समय शुभ नहीं है रुस्तम ने नाजिम को छोड़ दिया। बाद में रुस्तम साह ने ब्रिटिश सीमा पर शरण मांगी और उन्हें दियरा का तालुकदार बनाया गया जिसमें 336 गांव शामिल थे। रुस्तम साह ने अंग्रेजों से विद्रोह के दौरान उनको उत्कृष्ट सेवा प्रदान की थी । 1877 में उनका निधन हो गया और उनके भतीजे राजा रुद्र प्रताप सिंह ने उनका स्थान लिया। धन्यवाद नमस्कार आप सभी का स्वागत है हमारे यूट्यूब चैनल पर आशा करते हैं आपको यह वीडियो बहुत पसंद आई होगी इसी तरह की वीडियो को देखने के लिए हमारे चैनल ग्राउंडफैक्ट इंडिया को सब्सक्राइब जरूर करें और इस चैनल को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ! Contact-ambuj1011@gmail.com Thank you for Watching My channel Groundfact India / groundfactindi