У нас вы можете посмотреть бесплатно Bhagavad Gita 1.15 (हृषीकेश का अर्थ? धनंजय का अर्थ? वृकोदर का अर्थ? पाञ्चजन्य शंख की कथा) или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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हृषीकेश का अर्थ है – इन्द्रियों के स्वामी। हमारी सभी इन्द्रियाँ वास्तव में भगवान की ही हैं, इसलिए उनका सही उपयोग भगवान की सेवा में करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है— “हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते।” अर्थात् अपनी इन्द्रियों के द्वारा हृषीकेश (भगवान) की सेवा करना ही भक्ति कहलाता है। अर्जुन ने अपने जीवन की पूरी बागडोर भगवान के हाथों में सौंप दी थी। यही कारण है कि वे सदैव भगवान के निर्देश के अनुसार कार्य करते थे। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भी अपने जीवन में भगवान और उनके शुद्ध भक्तों से मार्गदर्शन लेना चाहिए। महाभारत के युद्ध में वास्तविक नायक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जो पाण्डवों के पक्ष में थे। भगवान को हृषीकेश कहा गया है, क्योंकि वे अर्जुन के रथ पर बैठकर अर्जुन की इन्द्रियों का संचालन कर रहे थे। वे केवल रथ की लगाम ही नहीं संभाल रहे थे, बल्कि अर्जुन के शरीर, मन और इन्द्रियों को भी नियंत्रित करके उन्हें पूर्ण रूप से मार्गदर्शन दे रहे थे। इस प्रकार जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को भगवान की सेवा में समर्पित कर देता है और उनके निर्देशानुसार जीवन जीता है, तब उसका जीवन सफल और विजयी हो जाता है। पाञ्चजन्य शंख की कथा भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए संदीपनि मुनि के आश्रम में अध्ययन किया। जब उनकी शिक्षा पूर्ण हुई, तब उन्होंने गुरु-दक्षिणा देने की इच्छा प्रकट की। संदीपनि मुनि ने कहा कि उनका पुत्र समुद्र में गया था और वापस नहीं आया। उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने पुत्र को वापस लाने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण समुद्र के पास गए और समुद्र देव से पूछा कि गुरु का पुत्र कहाँ है। समुद्र देव ने बताया कि पाञ्चजन नाम का एक असुर समुद्र में रहता है। यह असुर शंख के रूप में रहता था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उस असुर का वध कर दिया। उस असुर के शरीर से एक दिव्य शंख प्राप्त हुआ वही शंख पाञ्चजन्य कहलाया इसलिए उस शंख का नाम पाञ्चजन्य पड़ा। हालाँकि पाञ्चजन असुर को मारने के बाद भी गुरु का पुत्र वहाँ नहीं मिला। तब श्रीकृष्ण और बलराम यमराज के लोक गए और वहाँ से गुरु के पुत्र को वापस लेकर आए। इस प्रकार उन्होंने गुरु-दक्षिणा पूर्ण की। भगवान का शंख पाञ्चजन्य उनका नित्य और दिव्य शंख है। एक बार उस शंख को अपने सौभाग्य पर अभिमान हो गया। वह सोचने लगा— मैं भगवान के हाथ में रहता हूँ, भगवान के अधरामृत का पान करता हूँ, उनके मुख के समीप रहता हूँ। मैं अत्यंत सुंदर और भाग्यशाली हूँ, मानो कमल के ऊपर बैठा हुआ हंस हूँ। मैं तो लक्ष्मी देवी से भी अधिक सौभाग्यशाली हूँ। भगवान ने इस अभिमान को दूर करने के लिए एक लीला रची। तब लक्ष्मी देवी ने उसे शाप दिया कि वह असुर बन जाए। इस प्रकार वही शंख पाञ्चजन्य असुर के रूप में जन्मा। भगवान ने सोचा— यह तो मेरा ही सेवक है, इसे वापस अपने पास ले आना चाहिए। इसलिए भगवान ने उस असुर का वध करके अपने शंख को पुनः प्राप्त कर लिया। इसी कारण भगवान का नाम लेने से पहले उनके शंख पाञ्चजन्य का नाम भी लिया जाता है। इसी प्रकार यहाँ अर्जुन का नाम लेने से पहले उनके शंख का नाम देवदत्त लिया गया है। यह दिव्य शंख इन्द्रदेव ने अर्जुन को उपहार में दिया था। यह अत्यंत शक्तिशाली और गम्भीर ध्वनि करने वाला दिव्य शंख था। अर्जुन का एक नाम धनंजय भी है, जिसका अर्थ है— धन को जीतने वाला या धन संग्रह करने में निपुण। जब महाराज युधिष्ठिर यज्ञ करते थे, तब उसके लिए बहुत धन की आवश्यकता होती थी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उत्तर दिशा में जाने का निर्देश दिया। वहाँ राजा मरुत ने अपने यज्ञ में प्रयुक्त स्वर्ण-पात्रों को त्याग दिया था। ब्राह्मणों ने भी उन्हें उपहार में मिला स्वर्ण वहीं छोड़ दिया था। इस प्रकार वहाँ बहुत सारा सोना पड़ा हुआ था। भगवान की प्रेरणा से यह सिद्धांत माना गया कि त्यागी हुई संपत्ति पर राजा का अधिकार होता है। इसलिए अर्जुन वहाँ से वह सारा धन लेकर आए। इसी कारण अर्जुन को धनंजय कहा जाता है। भीष्म पितामह के शंख का कोई विशेष नाम नहीं बताया गया है, परन्तु पाण्डवों के पक्ष के सभी शंख दिव्य थे। संजय जब धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन सुना रहे थे, तब वे अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दे रहे थे कि आप यह आशा छोड़ दें कि दुर्योधन की विजय होगी। यह निश्चित है कि विजय पाण्डवों की ही होगी। जिन-जिन व्यक्तियों के शंखों के नाम बताए गए हैं, वे सभी शंख चिन्मय (दिव्य) हैं, अर्थात् वे सामान्य भौतिक शंख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दिव्य स्वरूप के हैं। भीमकर्मा एक विशेषण है, जिसका अर्थ है— जो महान और अद्भुत कार्य करने वाला हो। भीमसेन अत्यंत पराक्रमी थे। उन्होंने बकासुर, हिडिम्बासुर और कीचक जैसे भयंकर असुरों का वध किया। वृकोदर का अर्थ है— जिसके उदर में “वृक” नाम की प्रबल अग्नि विद्यमान हो। हमारे शरीर में एक जठराग्नि होती है, जिसके कारण हम जो भी भोजन करते हैं वह पचता है। किंतु भीम के उदर में मानो एक अतिरिक्त अग्नि थी, इसलिए उन्हें अधिक भोजन की आवश्यकता होती थी। कहा जाता है कि भीमसेन के ही अवतार श्री मध्वाचार्य हैं। जब पाण्डव लाक्षागृह से निकलकर जंगल की ओर जा रहे थे, तब सभी अत्यंत थक चुके थे और सबको भूख भी लगी थी। भीमसेन की भूख अधिक थी, इसलिए सभी भाइयों ने अपने-अपने हिस्से के भोजन का आधा भाग भीम को दे दिया। बाद में जब आगे चलकर सभी भाई और माता कुन्ती अत्यंत थक गए, तब भीमसेन ने ही सभी को अपने कंधों पर उठाकर जंगल के मार्ग से आगे बढ़ाया। आकाश में जब सूर्य विद्यमान रहते हैं, तब शरीर की जठराग्नि भी प्रबल रहती है। इसलिए दिन के समय, विशेषकर दोपहर में किया गया भोजन अच्छी प्रकार से पच जाता है। किंतु सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले जठराग्नि उतनी प्रबल नहीं रहती। इसीलिए कहा जाता है कि दोपहर के समय जो भी भोजन किया जाए, वह आसानी से पच जाता है।