У нас вы можете посмотреть бесплатно नर और नारायण का रहस्य, भीम ने किया नरभक्षी राक्षस का वध | Shri Krishna Jeevani или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
श्रीकृष्ण बलराम को अपने और श्रीकृष्ण से जुड़ा एक विशेष रहस्य बताते है कि भारत में हिमालय स्थित गंधमादन पर्वत पर नर और नारायण ने कई हजार वर्ष तपस्या की थी, वे ब्रह्मा जी के हृदय उत्पन्न महाराज धर्म के पुत्र थे। उनकी कठोर तपस्या से चिंतित होकर इंद्र तपस्या को भंग करने के लिए स्वर्ग की अप्सराओं को भेजता है। तपस्या भंग करने भंग करने में विफल होने पर वे अप्सराएं दिव्य पुष्प का प्रयोग करती है, जिससे वे अपनी आँखें खोल देते है। अप्सराओं को अभिमान तोड़ने के लिए नारायण अपनी जंघा के ऊपरी भाग से एक अतिसुन्दर अप्सरा उर्वशी को प्रकट करते है, जिसके नृत्य व गायन के आगे स्वर्ग की अप्सराएं टिक नहीं पाती है। नारायण भेंट स्वरूप उर्वशी को स्वर्गलोक इंद्र का पास भेज देते है। यही नर और नारायण द्वापर युग में श्रीकृष्ण यानि मैं और मेरे सखा अर्जुन के रूप में प्रकट हुए, जिसका ज्ञान किसी को नहीं है। श्रीकृष्ण जिस समय यह रहस्य बलराम को बता ही रहे थे कि तभी लाक्षागृह की आग में पाण्डवों के मारे जाने की सूचना लेकर अक्रूर आते है। यह सूचना सुनकर बलराम भावुक हो जाते है और वह श्रीकृष्ण से सांत्वना देने के लिए हस्तिनापुर चलने का आग्रह करते है। श्रीकृष्ण कहते है कि दुख तो उसके साथ बाँटा जाता है, जो दुखी हो। हस्तिनापुर में पाण्डवों के मरने पर कोई दुखी नहीं है, महाराज धृतराष्ट्र भी नहीं। मरने वाले के लिये कोई नहीं रोता, सब अपने-अपने नुकसान के लिए रोते है। केवल माँ का दुख सच्चा होता है, लेकिन जब माता कुन्ती भी अपने पुत्रों के साथ चली गयी, तो किसका दुख बाँटने जाएं। श्रीकृष्ण को मुस्कराते हुए देख बलराम कहते है कि भक्त पर विपदा आने पर भगवान भी तड़पते हैं, परंतु आप अपने प्रिय भक्त अर्जुन की मृत्यु पर क्यों नहीं तड़पे? तब श्रीकृष्ण रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए कि जिसकी रक्षा का वचन स्वयं मैंने दिया हो, उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है, आपने यह क्यों नहीं सोचा। श्रीकृष्ण की बात का मर्म समझकर बलराम और अक्रूर के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव उमड़ते हैं। वही दूसरी ओर हस्तिनापुर में भीष्म पाण्डवों के जलकर मर जाने की सूचना पर अपना अविश्वास जताते हुए गुरु द्रोणाचार्य से तर्क वितर्क करते है और महर्षि वेद व्यास जी द्वारा की गई भविष्यवाणी प्रश्न चिन्ह लगाते है। तब आचार्य द्रोण कहते हैं कि ज्योतिष की गणना में भी भूल हो सकती है, जैसे श्रीराम को राज्याभिषेक के शुभ मुहूर्त वनवास जाना पड़ा था। अपनी शंकाओं को मिटाने के लिए भीष्म विदुर को बुलाते है और उसे प्रश्न करते है। विदुर लाक्षागृह काण्ड के बारे में विस्तार से बताने के बाद अंत में कहते है कि सभी पाण्डवों सुरक्षित बच निकले। यह सुन भीष्म विदुर का माथा चूमते हुए उन्हें आशीर्वाद देते हैं। वही दूसरी ओर बलराम श्री कृष्ण से पूछते है कि पाँचों पाण्डव है कहाँ? उत्तर में श्री कृष्ण कहते है कि वे इस समय ब्राह्मण वेश में पांचाल में रहकर भिक्षा से जीवन यापन कर रहे है। एक दिन पाँचों पाण्डव अपनी माता कुन्ती के साथ भिक्षा में मिला हुआ भोजन मिल बाँट कर खा रहे होते है कि तभी उस ब्राह्मण के घर से रोने की आवाज सुनाई देती है, जिसने उन्हें रहने के लिए कुटिया दी हुई थी। घर के अंदर जाने पर उन्हें ज्ञात होता है कि वह नगर एक नरभक्षी राक्षस के आतंक से ग्रस्त है, जिसे समझौते के अनुसार प्रतिदिन भोजन के लिए अनाज, दूध और एक मनुष्य भेजा जाता है और आज पाण्डवों को शरण देने वाले ब्राह्मण गंगाधर की बारी थी। उस परिवार के सभी सदस्य पति, पत्नी और पुत्री पारस्परिक प्रेम और धर्मनिष्ठा का परिचय एक-दूसरे के स्थान पर जाने को तैयार थे। जिसे देखकर कुन्ती अपने पर किए गए उपकार को चुकाने के लिए अपने एक पुत्र को भेजने का निश्चय करती है। ब्राह्मण के विरोध करने पर कुन्ती उसे आश्वस्त करती है कि उसके पुत्र का राक्षस अंत नहीं कर सकता है। माता की मंशा समझकर भीम स्वयं राक्षस के पास भोजन लेकर पहुँच जाते है और वहाँ उस भोजन स्वयं खाने लगते है, जिससे राक्षस को क्रोध आ जाता है। भीम और राक्षस में भयंकर युद्ध होता है। अद्भुत बलशाली भीम उस मायावी विशाल राक्षस के सींग उखाड़कर उसका वध कर देते है और नगर को सदैव के लिए राक्षस के भय से मुक्त कर देते है। सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #tilak #krishna #shreekrishna #shreekrishnajeevani #krishnakatha