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दिल्ली सल्तनत में बारिश हो रही है। कल के राजपथ और आज के कर्तव्य पथ पर राजनीतिक तापमान रायसीना पहाड़ी की तरह ऊपर चढ़ रहा है। रंग-बिरंगे परिधानों में नेतागण, अधिकारीगण कभी 'राष्ट्रध्वज' को देख रहे हैं, तो कभी 'संविधान के प्रस्तावना' को नज़रों के सामने रख रहे हैं। यह सैद्धांतिक व्यवहार है उनका। व्यावहारिक तौर पर शरीर से स्थिर होने के बाद भी हाथ में पकड़े एक यंत्र और कान में रखे दूसरे यन्त्र के कारण चलते-फिरते नजर आ रहे हैं। राष्ट्र 77वां गणतंत्र मना चुका है। कर्तव्यपथ पर आगन्तुओं के बैठने के लिए लायी गयी कुर्सियों को, वाद्ययंत्रों को, आवाज वाले डब्बों को, गलीचों को, बांस-बल्लों को 'ठेकेदार' के लोग खोल रहे हैं। ठेकेदार के कुछ लोग कागजों पर हिसाब-किताब भी लिख रहे हैं ताकि कोई सामान नहीं छूटे। कई एक सौ करोड़ का योजना होता है यह महापर्व। इसी रास्ते मुंबई सीने जगत के भीष्म पितामह के नाम से अंकित पृथ्वीराज रोड होते अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के रास्ते ग्रीन पार्क जा रहा हूँ। आज से 29 वर्ष पहले दिल्ली सल्तनत के विख्यात प्रॉपर्टी डीलर, बिल्डर अंसल भाइयों का सिनेमा हौल 'उपहार' अग्निकांड में 59 लोग, बच्चे, बूढ़े, महिला, पुरुष मृत्यु को प्राप्त किये थे। दिल्ली सल्तनत की पुलिस के अलावे भारत के विख्यात अन्वेषण संस्थान सीबीआई इस कांड की तहकीकात की थी। इस कांड में मरने वाले परिवारों के लोग इस आशा में रहे की कानून बनाने वालों, कानून का पालन करबाने वालों के हाथों न्याय मिलेगा। सभी दिवंगत आत्माओं को शांति मिलेगी। लेकिन वे नहीं जानते थे कि भारत के संविधान में जो लिखा है, कानून के किताबों में जो छपा है, वह सैद्धांतिक है। व्यावहारिक रूप आते आते दोनों रेल की पटरियों जैसी अलग अलग होती है, जो कभी नहीं मिलती। उपहार अग्निकांड में मरने वालों को, उनके परिवार और परिजनों को भी न्याय नहीं मिला। जिस समय यह घटना घटी थी, 'बॉर्डर' फिल्म का एक गीत चल रहा था। नीलम कृष्णमूर्ति और शेखर कृष्णमूर्ति अपने दो बच्चों - उन्नति और उज्ज्वल - के अलावे 57 अन्य माता-पिता अपने-अपने संतानों को खो दिया। कितने सुहाग उजड़ गए। कितनी चूड़ियां टूट गयी। इस सिनेमा में सन्नी देवल की प्रमुख भूमिका थी। यह दंपत्ति 28 अन्य मृतक के परिवारों के साथ न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़े। इनका कहना है न्याय नहीं मिला। इस बीच, इनकी क़ानूनी लड़ाई को लेकर नेटफ्लिक्स पर Trail By Fire सीरीज का प्रार्शन हुआ। इसमें सन्नी देवल का भाई अभय देवल मुख्य भूमिका में थे। विगत दिनों सन्नी देवल की अगुवाई अभिनय में बॉर्डर-2 बना और विगत 23 जनवरी को, दिल्ली सहित देश के अन्य सिनेमा घरों में प्रदर्शन के लिए लटका। आज कृष्णमूर्ति दंपत्ति से मिला। लम्बी बात हुई। उपहार सिनेमा घर भी जाकर देखा। कृष्णमूर्ति दंपत्ति का कहना है कि मुंबई फिल्म जगत के लोग 'संवेदनहीन' हैं। 13 जून, 1997 को जिस दिन उतने लोग मृत्यु को प्राप्त किये, से आज तक मुंबई फिल्म जगत का कोई भी कलाकार, अदाकार, अदाकारा एक शब्द का भी संवेदना उन मृतक परिवारों, परिजनों को नहीं दिया। मैं तो उस सिनेमा का नाम लेना भी छोड़ दी जिसके प्रदर्शन के दौरान इतने लोग मृत्यु को प्राप्त किये। आज जब उसका दूसरा भाग बनाया गया है। नीलम और शेखर कृष्णमूर्ति और उपहार सिनेमा अग्निकांड के दूसरे पीड़ितों के परिवारों द्वारा अपनाया गया कानूनी रास्ता उतार-चढ़ाव से भरा है, लेकिन न्याय की तलाश अभी भी जारी है। कृष्णमूर्ति परिवार पहले दक्षिणी दिल्ली में रहते थे। अपना मकान था। अपने संतानों की मृत्यु के बाद उस घर को बेचकर नोएडा सेक्टर 33 में आ गए। घर में शांति है। पहली मंजिल पर स्थित घर के प्रवेश के साथ दाहिने कोने में कृष्णमूर्ति अपने दोनों संतानों की तस्वीर रखे है। जिस स्थान पर यह तस्वीर रखी है, माता-पिता के साथ-साथ घर में आने वाले प्रत्येक आगंतुकों की नजर उसपर पड़ेगी ही। और जब नजर पड़ेगी तो आखें भर भी आएगी। आज अगर दोनों जीवित होते तो दोनों चालीस वर्ष के होते। उन्नति और उज्जवल इ पार्थिव शरीर से माता-पिता वादा किये थे, हम न्याय अवश्य दिलाएंगे, कोशिश भी किये 29 वर्ष तक और कोशिश जारी भी है, लेकिन देश की न्यायिक व्यवस्था पर अब विश्वास डगमगा गया है। फिर भी कोशिश करते रहेंगे। कभी बेहद खुश रहने वाला परिवार के चेहरे पर आज हंसी नाम की कोई चीज नहीं है, हंसने का वजह भी नहीं है।