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ध्यान केवल आँखें बंद कर लेना नहीं है, बल्कि यह आत्मा की उस यात्रा का आरंभ है जहाँ मन, वचन और कर्म की अशांति धीरे-धीरे शांत होकर आत्मचेतना में विलीन होने लगती है। परम पावन आचार्य सुशील कुमार जी महाराज ने ध्यान योग को केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला बताया। उनके अनुसार ध्यान वह सेतु है जो मानव को बाहरी संसार की अशांति से उठाकर भीतर की दिव्य शांति से जोड़ देता है। ध्यान योग क्रिया की शुरुआत शरीर को स्थिर करने से होती है। साधक शांत स्थान पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर अपनी रीढ़ को सीधा रखता है। शरीर स्थिर होता है तो श्वास की गति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। श्वास भीतर आती है, बाहर जाती है—उसे बिना किसी प्रयास के केवल देखना है। यही जागरूकता मन को वर्तमान क्षण में ले आती है। परम पावन आचार्य सुशील कुमार जी महाराज कहते थे कि जब श्वास पर जागरूकता आती है, तब मन की चंचलता स्वतः कम होने लगती है। इसके बाद मंत्र ध्यान की प्रक्रिया आती है। विशेष रूप से नामोकार मंत्र का स्मरण मन को पवित्रता और ऊर्जा से भर देता है। मंत्र के उच्चारण के साथ साधक अपने भीतर रंगों की दिव्य तरंगों का अनुभव कर सकता है। रंग विज्ञान और ध्यान का यह समन्वय गुरुजी की विशेष देन थी, जिसमें प्रत्येक रंग को एक विशेष आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा गया। जब साधक इन रंगों की कल्पना करता है, तो उसका मन क्रमशः शुद्ध, संतुलित और प्रकाशमय होता जाता है। ध्यान योग क्रिया का अंतिम चरण आत्मदर्शन है। यहाँ साधक अपने भीतर उठते विचारों को बिना प्रतिक्रिया के देखता है। न कोई विरोध, न कोई आकर्षण—केवल साक्षीभाव। यही साक्षीभाव धीरे-धीरे आत्मानुभूति में परिवर्तित हो जाता है। परम पावन आचार्य सुशील कुमार जी महाराज ने समझाया कि जब मन शांत हो जाता है, तब आत्मा की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देने लगती है, और वही सच्चा मार्गदर्शन है। ध्यान योग क्रिया का नियमित अभ्यास व्यक्ति के भीतर करुणा, सहनशीलता और सकारात्मक ऊर्जा का विकास करता है। यह केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और आंतरिक शक्ति का आधार है। गुरुजी का संदेश स्पष्ट था—यदि मानव अपने भीतर शांति स्थापित कर ले, तो विश्व में शांति स्वतः स्थापित हो सकती है।