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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, परंतु युद्ध का अंत जीवन का अंत नहीं होता, युद्ध का अंत केवल शोर का अंत होता है, उसके बाद जो शुरू होता है वह होता है मौन, और वह मौन कभी-कभी शंखनाद से भी अधिक भयानक होता है, कुरुक्षेत्र की धरती पर वही मौन पसरा हुआ था, जहाँ कभी रथों की गर्जना थी, जहाँ कभी धनुषों की टंकार थी, जहाँ कभी “हर हर” और “जय” के नाद गूँजते थे, आज वहाँ केवल हवा बह रही थी, और वह हवा भी जैसे शोक में धीमी हो गई थी, पृथ्वी पर पड़े हुए वीर ऐसे लग रहे थे मानो धरती स्वयं थककर सो गई हो, रक्त से सनी मिट्टी यह पूछ रही थी कि क्या यही धर्म है, क्या यही न्याय है, और क्या यही मनुष्य का अंतिम मार्ग है, हस्तिनापुर की ओर यदि दृष्टि जाए तो वहाँ भी कोई उत्सव नहीं था, राजमहलों में दीप नहीं जले थे, गलियों में मंगलगीत नहीं थे, केवल स्त्रियों का विलाप था, बच्चों की सिसकियाँ थीं, और वृद्धों की मौन पीड़ा थी, जिन राजवंशों ने पीढ़ियों तक शासन किया था वे एक ही युद्ध में समाप्त हो गए थे, और इस समस्त दृश्य को देख रही थीं माता कुंती, जिनके पाँच पुत्र जीवित थे, पर जिनका हृदय जीवित नहीं रह पाया था, क्योंकि जो माँ लाखों पुत्रों को मरते देख ले, वह अपने पाँच पुत्रों के जीवित रहने पर भी प्रसन्न नहीं रह सकती, कुंती का मन बार-बार अतीत में जा रहा था, उन्हें पांडवों का वनवास याद आ रहा था, उन्हें द्रौपदी का अपमान याद आ रहा था, उन्हें सभा में हँसी उड़ाते कौरव याद आ रहे थे, और साथ ही उन्हें भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महावीरों का अंत भी याद आ रहा था, और कुंती के भीतर एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि क्या यह सब टाला जा सकता था, क्या यदि श्रीकृष्ण चाहते तो यह युद्ध रोका जा सकता था, क्योंकि वे केवल पांडवों के मित्र नहीं थे, वे तो स्वयं काल थे, स्वयं ईश्वर थे, और जब एक माँ के मन में यह प्रश्न जन्म ले लेता है, तब वह दर्शन नहीं पूछती, वह उत्तर माँगती है, और इसी प्रश्न को लेकर माता कुंती श्रीकृष्ण के पास पहुँचीं, श्रीकृष्ण उस समय अत्यंत शांत थे, जैसे उनके भीतर कोई हलचल ही न हो, पर यह वही शांति थी जो समुद्र के गर्भ में होती है, कुंती की आँखों से आँसू बहने लगे, उनका स्वर काँपने लगा, और उन्होंने कहा कि हे माधव, मैं जानती हूँ कि यह युद्ध धर्म के लिए था, मैं जानती हूँ कि अधर्म का अंत आवश्यक था, पर क्या अधर्म को मिटाने के लिए इतने जीवन आवश्यक थे, क्या लाखों माताओं की गोद सूनी होना भी धर्म का ही भाग था, आपने सब कुछ जानते हुए यह होने दिया, आपने चाहा होता तो एक शब्द से दुर्योधन का अहंकार तोड़ सकते थे, आपने चाहा होता तो यह विनाश रुक सकता था, कुंती के ये शब्द क्रोध नहीं थे, वे प्रश्न थे, वे वेदना थे, वे एक स्त्री की पुकार थे, श्रीकृष्ण ने बड़े करुण भाव से कहा कि माता, जब अधर्म अपनी सीमा पार कर लेता है तब सृष्टि स्वयं उसे नष्ट करती है, मैं केवल माध्यम था, पर कुंती का हृदय उस तर्क को स्वीकार नहीं कर पा रहा था, क्योंकि शास्त्र मन को समझाते हैं, हृदय को नहीं, और उसी हृदय की अग्नि से निकले वे शब्द जिन्हें संसार ने शाप कहा, कुंती ने कहा कि हे कृष्ण, जिस प्रकार इस युद्ध ने समस्त कुलों को अपने ही हाथों नष्ट कराया, उसी प्रकार आपका यादव वंश भी अपने ही अहंकार और मद से नष्ट होगा, वे आपस में ही युद्ध करेंगे, भाई भाई का वध करेगा, और आप स्वयं इस पृथ्वी पर अपने प्रियजनों के विनाश को देखकर अंत में अकेले रह जाएंगे, यह कहते समय कुंती रो रही थीं, और श्रीकृष्ण मौन थे, क्योंकि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें रोका नहीं जाता, उन्हें स्वीकार किया जाता है, श्रीकृष्ण ने कहा कि माता, आपने जो कहा वह शाप नहीं है, वह काल का विधान है, यादवों में भी अब धर्म क्षीण हो रहा है, और जब किसी भी कुल में मद बढ़ता है, तब उसका अंत निश्चित होता है, समय बीतता है, यादवों में कलह बढ़ता है, ऋषियों का अपमान होता है, प्रभास क्षेत्र में विनाश होता है, बलराम योग द्वारा देह त्यागते हैं, और अंततः श्रीकृष्ण एक साधारण से शिकारी के बाण से इस धरती पर अपनी लीला पूर्ण करते हैं, उस क्षण न कोई युद्ध होता है, न कोई शोर, केवल मौन होता है, और वही मौन इस कथा का सबसे बड़ा उपदेश है, कि ईश्वर भी अपने बनाए नियमों से बंधे होते हैं, वे किसी के पक्ष में नहीं होते, वे केवल धर्म के पक्ष में होते हैं, और युद्ध चाहे धर्म के लिए हो, वह अंततः शोक ही छोड़ता है, इसीलिए करुणा ही सबसे बड़ा धर्म है, विवेक ही सबसे बड़ा अस्त्र है, और अहंकार ही सबसे बड़ा शत्रु है