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The battle between Kalki vs kali कल्कि बनाम कली – धर्म और अधर्म का अंतिम युद्ध कलियुग अपनी चरम सीमा पर था। धरती पर धर्म कमजोर, अधर्म शक्तिशाली, और मानवता कराह रही थी। सत्य को झूठ कहा जाने लगा था, और झूठ ही सत्ता बन चुका था। राजाओं के हृदय में लोभ था, ऋषियों की वाणी को दबाया जा रहा था, और देवताओं की प्रार्थनाएँ भी मौन हो चुकी थीं। इसी अंधकार में, कली — अधर्म का सजीव स्वरूप — मानव रूप धरकर पृथ्वी पर राज कर रहा था। उसकी आँखों में अहंकार की आग थी और हँसी में विनाश का स्वर। ⸻ कल्कि का अवतरण जब धर्म की अंतिम लौ भी काँपने लगी, तब वैष्णव शक्ति जागी। शम्भल ग्राम में, एक दिव्य प्रकाश के साथ भगवान विष्णु ने अपने अंतिम अवतार — कल्कि — को जन्म दिया। कल्कि की आँखों में क्रोध नहीं, बल्कि न्याय की ज्वाला थी। उनके हाथ में थी देवदत्त — चमकती हुई दिव्य तलवार, और उनके साथ था श्वेत अश्व, जो समय से भी तेज दौड़ सकता था। आकाश गूँज उठा— “अब अधर्म का अंत निश्चित है।” ⸻ कली का आतंक कली को जैसे ही कल्कि के आगमन का आभास हुआ, उसने हँसते हुए कहा— “धर्म अब इतिहास है… और इतिहास को मैं लिखता हूँ!” उसने अपने काले जादू से राजाओं को उकसाया, युद्ध भड़काए, और पृथ्वी को रक्त से रंग दिया। ⸻ महायुद्ध की शुरुआत अंततः वह क्षण आया जब कल्कि और कली आमने-सामने खड़े थे। आकाश लाल था, पृथ्वी काँप रही थी, और समय स्वयं थम गया था। कली ने गर्जना की— “मैं कलियुग हूँ! मुझे नष्ट करना असंभव है!” कल्कि शांत स्वर में बोले— “कलियुग का अंत ही मेरा उद्देश्य है।” ⸻ देवदत्त बनाम अधर्म जैसे ही कल्कि ने देवदत्त उठाई, प्रकाश ने अंधकार को चीर दिया। तलवारों की टकराहट से पर्वत टूटने लगे, और आकाश में बिजली नाच उठी। कली ने छल किया, माया रची, पर धर्म की तलवार माया से परे थी। एक अंतिम प्रहार के साथ कल्कि ने कली के अहंकार को चीर दिया। ⸻ कलियुग का अंत कली चीख उठा— और अंधकार राख में बदल गया। धरती पर शांति लौटी, नदियाँ निर्मल हुईं, और मानवता ने फिर से सत्य की ओर कदम बढ़ाए। कल्कि ने श्वेत अश्व पर सवार होकर कहा— “धर्म कभी नष्ट नहीं होता। वह केवल सही समय की प्रतीक्षा करता है।” और फिर, वे प्रकाश में विलीन हो गए। ⸻ संदेश जब भी अधर्म बढ़ेगा, जब भी सत्य दबेगा, धर्म अवश्य अवतरित होगा। If you like 👍 this story like and subscribe my channel