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Kaal Bhairav Ashtakam | कालभैरवाष्टकम् | Most Powerful Mantra of Kaal Bhairav- Kalabhairava Ashtakam ~~~~~~~~~ Kaal Bhairav Ashtakam is a powerful and deeply sacred Shiva stotra that glorifies Lord Kaal Bhairav, the fierce protector of Kashi and the destroyer of fear, karma, and time itself. This Ashtakam describes Kaal Bhairav as the supreme guardian of dharma, the granter of both bhukti (worldly fulfillment) and mukti (liberation), and the compassionate remover of sins, obstacles, and negative energies. Reciting or listening to Kaal Bhairav Ashtakam with devotion is believed to destroy fear of death, remove planetary afflictions, cleanse past karmas, and bestow inner strength, clarity, and spiritual awakening. Especially powerful when chanted at night, on Kalashtami, or during deep sadhana, this stotra creates a protective spiritual shield and connects the devotee directly to the fierce yet benevolent grace of Lord Shiva in his Bhairav form. ॥ कालभैरवाष्टकम् — श्लोक एवं भावार्थ ॥ देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्। नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: देवराज इंद्र तथा अन्य देवताओं द्वारा पूजित जिनके पवित्र चरणकमल हैं, जो सर्प को यज्ञसूत्र के रूप में धारण करते हैं और जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है। जो कृपालु हैं, नारद आदि योगियों द्वारा वंदित हैं, ऐसे दिगंबर, काशी के अधिपति भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ। भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलवर्णशोभिताङ्गभूतिदानविग्रहम्। नित्यं एव शान्तमेककैवल्यसाधकं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जो करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जो संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाले परम तत्व हैं। जिनका नीलवर्ण शरीर शोभायमान है, जो सदा शांत हैं और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं — ऐसे काशीपति कालभैरव को मैं नमन करता हूँ। शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्। भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जो हाथों में त्रिशूल, अंकुश, पाश और दंड धारण करते हैं, जो श्यामवर्ण, आदिदेव, अविनाशी और रोगरहित हैं। जिनका पराक्रम अत्यंत भयानक है और जो दिव्य तांडव के प्रिय हैं — ऐसे कालभैरव को मैं नमन करता हूँ। भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहम् भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्। विनिक्वणन्मणिप्रवेकमुक्तिकण्ठमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाले हैं, जिनका स्वरूप अत्यंत सुंदर और दिव्य है। जो भक्तों के प्रति वात्सल्य रखते हैं और जिनके कंठ में रत्नजड़ित हार शोभायमान है — ऐसे काशीपति कालभैरव को मैं नमन करता हूँ। धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मदानभास्करम्। स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जो धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और अधर्म के मार्ग का विनाश करते हैं। जो कर्मबंधन से मुक्त करने वाले और कल्याण प्रदान करने वाले हैं। जिनका शरीर स्वर्णिम आभा से युक्त है — ऐसे कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम्। मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जिनके चरण रत्नजड़ित पादुकाओं से सुशोभित हैं, जो अद्वितीय, निर्मल और प्रिय आराध्य हैं। जो मृत्यु के अहंकार को नष्ट करते हैं और भयानक दंष्ट्रों से भी मुक्ति प्रदान करते हैं — ऐसे कालभैरव को मैं नमन करता हूँ। अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्। अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जिनकी अट्टहास से ब्रह्मांड कांप उठता है, जिनकी एक दृष्टि से पापों का पूर्ण नाश हो जाता है। जो आठों सिद्धियाँ प्रदान करते हैं और कपालों की माला धारण करते हैं — ऐसे कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधनं विभुम्। नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ भावार्थ: जो भूतगणों के स्वामी हैं, जो अपार कीर्ति प्रदान करते हैं। जो काशीवासियों के पुण्य-पाप का शोधन करते हैं, जो नीति के ज्ञाता, प्राचीन और सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं — ऐसे काशीपति कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।