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महादेव की कांवड़ (या कांवड़ यात्रा) एक अत्यंत पवित्र और लोकप्रिय हिन्दू धार्मिक यात्रा है, जो विशेष रूप से श्रावण माह (जुलाई–अगस्त) में की जाती है। इसमें शिवभक्त—जिन्हें कांवड़िये कहा जाता है—गंगा नदी से जल लाकर उसे शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। यह यात्रा आस्था, तपस्या और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। 🔱 कांवड़ यात्रा का सार: कांवड़: यह एक लकड़ी की छड़ी होती है, जिसके दोनों सिरों पर जल के मटके या पात्र लटकाए जाते हैं। इसे भक्त कंधों पर रखकर यात्रा करते हैं। गंगाजल लाना: भक्त गंगा नदी (जैसे हरिद्वार, गंगोत्री, सुल्तानगंज आदि) से जल भरते हैं। गंगाजल चढ़ाना: गंगाजल को शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है—जैसे कि काशी विश्वनाथ (वाराणसी), बाबा बैद्यनाथ (देवघर), केदारनाथ, बाबा भोलेनाथ के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों में। व्रत और नियम: कांवड़िये आमतौर पर यात्रा के दौरान शुद्धता, संयम और उपवास रखते हैं। कुछ लोग नंगे पांव ही यात्रा करते हैं। 🚩 प्रमुख स्थान जहाँ से कांवड़ चलाई जाती है: हरिद्वार (उत्तराखंड) – सबसे बड़ा कांवड़ मेला गंगोत्री – पवित्र जल का प्रमुख स्रोत सुल्तानगंज (बिहार) – यहाँ गंगा उत्तरवाहिनी है, और यहां से देवघर (बाबा बैद्यनाथ) तक जल लाया जाता है गौमुख – गंगा का उद्गम स्थल 🔥 कांवड़ यात्रा के प्रमुख प्रकार: डाक कांवड़: इसमें बहुत तेज़ गति से (लगातार) बिना रुके जल पहुँचाया जाता है। बैलगाड़ी कांवड़: कुछ भक्त गाड़ी से जल लाते हैं (कम आम है)। पैदल कांवड़: सबसे पारंपरिक और कठिन रूप; नंगे पांव लंबी दूरी तय करते हैं। 🕉️ कांवड़ यात्रा का महत्व: यह भगवान शिव को गंगाजल अर्पण करने की पौराणिक परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि इससे शिव प्रसन्न होते हैं और भक्त के पाप कटते हैं। यह भक्ति, समर्पण, अनुशासन और सहनशीलता की परीक्षा भी है। 📜 पौराणिक मान्यता: जब समुद्र मंथन में हलाहल विष निकला था, तो भगवान शिव ने उसे पी लिया। उन्हें शांत करने के लिए देवताओं ने गंगा जल अर्पित किया। तभी से यह परंपरा चली कि श्रावण में शिव को गंगा जल चढ़ाना शुभ और पुण्यदायक माना जाता है। #mahadev #haridwar #harkipori #kavar